आचार्य करणसिह    नोएडा

 पवित्र वेदवाणी

 "मन्त्र मे राष्ट्रवादी जन परमात्मा से प्रार्थना कर रहे है।"

 ऋषि-वामदेवः,देवल  देवता-विश्वदेवा:,अग्नि

  त्वमग्ने वसूरिह रुद्राम्आदित्याम्उत।

 यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्।।

सामप्र१म

पदार्थ-हे अग्नेपरमात्मन्!(त्वम्) जगदीश्वर आप(इह)हमारे इस राष्ट्र में

(वसून्)धन,धान्य आदि सम्पत्ति से अन्य वर्णो को बसाने वालेउत्कृष्ट वश्यो को,(रूद्रान्)शत्रुओं को बुलाने वाले क्षत्रियों को,(आदित्यान्)प्रकाशित सूर्य किरणों के समान विद्या प्रकाश से युक्त ब्राह्मणो को,(उत)और(स्वध्वरं) शुभ यज्ञ करने वाले,(मनुजातम्) मनुष्य समाज के कल्याणार्थ जन्म लेने वाले,(घृतप्रुषम्)यज्ञाग्नि मेअथवा सत्पात्रो मे घृत आदि को सींचने वाले

(जनम्)पुत्र को यज्ञ प्रदान कीजिये ।।६।

  अब वसुवो, रुद्रो और आदित्यो के उपयुक्त अर्थ करने में प्रमाण लिखते हैं। 'वसवः' से वैश्य जन गृहीत होते हैं, क्योंकि यजुर्वेद 8/18 मे वसुवो से धन की याचना की गई है। रुद्रो से क्षत्रिय अभिप्रेत है, क्योंकि रूद्र का वर्णन वेदों में इस रूप में मिलता है, 'हे रूद्र' तेरी सेनाएं हमसे भिन्न हमारे शत्रु को विनष्ट करें, ऋग्वेद- 2/33/ 11 उस रूद्र के सम्मुख अपनी वाणीयों को प्रेरित करो,जिसके पास स्थिर धनुष है, वेगगामी बाण है, जो स्वयं आत्म रक्षा करने में समर्थ है, किसी से पराजित नहीं होता, शत्रुओं का का पराजेता हैऔर तीव्र शस्त्रास्त्रों से युक्त है, ऋग्वेद-7/ 46/1। आदित्यो से ब्राह्मण ग्रह्य है,क्योंकि तैसंहिता में कहा है कि ब्राह्मण ही आदित्य है,     तैसं- 1/1/9/8

 भावार्थ- हे जगत साम्राज्य के संचालक, देवाधिदेव परमपिता परमेश्वर! ऐसी कृपा करो कि हमारे राष्ट्र में धन-दान से सब वर्णाश्रमो का पालन करने वाले उत्तम कोटि के वैश्य जन, युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले वीर क्षत्रिय और आदित्य के समान ज्ञान-प्रकाश से पूर्ण विद्वद् वर और ब्राह्मण उत्पन्न हो और सब लोग तरह-तरह के परोपकार रूप यज्ञो का अनुष्ठान करने वाली, मानव समाज का कल्याण करने वाली, अग्निहोत्र-परायण अतिथियों का घृत आदि से सत्कार करने वाली सुयोग संतान को प्राप्त करें। 

बोध- हमारा राष्ट्र और समाज सब प्रकार से उन्नतशील हो, धन-धान्य से परिपूर्ण हो, शत्रुओं के भय से रहित हो, वर्ण व्यवस्था सुंदर हो, ऐसी प्रार्थना कीजिए