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डोंट मिस अ बीट’: कम उम्र से ही हृदय स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी


❤️ 30–40 की उम्र में भी बढ़ रहे हृदय संबंधी जोखिम, विशेषज्ञों ने समय पर जांच और चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज न करने की दी सलाह
 मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर 
 हृदय रोग को लंबे समय तक बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन बदलती जीवनशैली के बीच कम उम्र के वयस्कों में भी हृदय संबंधी जोखिम कारकों को लेकर चिंता सामने आ रही है। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वास्थ्यकर खान-पान, नींद की कमी और लंबे समय तक रहने वाला तनाव हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
विश्व हृदय दिवस के अवसर पर यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल से जुड़े कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों ने कम उम्र से ही हृदय स्वास्थ्य को लेकर जागरूक रहने और संभावित चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज नहीं करने पर जोर दिया। इस वर्ष के संदेश ‘डोंट मिस अ बीट’ का उद्देश्य भी हृदय संबंधी जोखिमों और चेतावनी संकेतों को समय रहते पहचानने की आवश्यकता को रेखांकित करना है।
30–40 की उम्र में भी दिख रहे जोखिम कारक
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन के सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी-कार्डियोलॉजी डॉ. कृष्ण यादव ने कहा कि हृदय संबंधी समस्याएं अब केवल अधिक उम्र के लोगों तक सीमित चिंता नहीं हैं। उनके अनुसार उनकी ओपीडी में 30–40 वर्ष की उम्र के मरीजों में भी हृदय संबंधी समस्याएं और उनसे जुड़े जोखिम कारक देखने को मिल रहे हैं।
उन्होंने बताया कि हृदय संबंधी समस्याओं वाले मरीजों में उनके अनुभव के अनुसार करीब 30 प्रतिशत महिलाएं और 70 प्रतिशत पुरुष हैं। उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक गतिविधि की कमी, अस्वास्थ्यकर खान-पान और तनाव जैसे कई जोखिम कारक एक साथ देखने को मिल सकते हैं।
डॉ. यादव के मुताबिक कई हृदय संबंधी जोखिम कारकों के शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते, इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण है। उन्होंने सीने में लगातार भारीपन या जकड़न, सांस लेने में परेशानी, अत्यधिक पसीना, अचानक कमजोरी या दर्द का हाथ, पीठ, गर्दन अथवा जबड़े तक जाना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दी।
बच्चों और युवाओं में भी सामने आ रही हृदय संबंधी समस्याएं
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, ग्रेटर नोएडा, ओमेगा-1 के सीनियर कंसल्टेंट-कार्डियोलॉजी डॉ. दीपांकर वत्स ने कहा कि हृदय स्वास्थ्य अब केवल बुजुर्गों तक सीमित विषय नहीं रह गया है।
उन्होंने बताया कि उनकी ओपीडी में हर महीने करीब 75–80 मरीज आते हैं, जिनमें वयस्कों के साथ बच्चे भी शामिल हैं। इनमें कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और हार्ट फेल्योर जैसी समस्याओं के साथ बच्चों में जन्मजात हृदय संबंधी समस्याओं के मामले भी सामने आते हैं।
डॉ. वत्स के अनुसार हृदय रोग सामान्य तौर पर 45–50 वर्ष की उम्र के बाद अधिक देखने को मिलता है, लेकिन कम उम्र के वयस्कों में भी जोखिम कारक बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। निष्क्रिय जीवनशैली, मोटापा, तनाव, नींद की कमी, अस्वास्थ्यकर खान-पान और धूम्रपान को उन्होंने प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल किया।
उन्होंने कहा कि सीने में दर्द या दबाव, सांस फूलना, अधिक पसीना, चक्कर या अचानक कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या परिवार में हृदय रोग का इतिहास रखने वाले लोगों के लिए नियमित जांच महत्वपूर्ण है।
महिलाओं में भी जोखिम को नजरअंदाज न करने की जरूरत
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, मॉडल टाउन, नई दिल्ली के वाइस चेयरमैन एवं एचओडी-कार्डियोलॉजी डॉ. चंद्रशेखर ने बताया कि उनकी कार्डियोलॉजी ओपीडी में हर महीने करीब 500 हृदय रोगी आते हैं।
उनके अनुसार हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, सीने में दर्द, हृदय की धड़कन से जुड़ी समस्याएं और हार्ट फेल्योर जैसे मामले देखने को मिलते हैं। डायबिटीज, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता, अस्वास्थ्यकर खान-पान और लंबे समय तक रहने वाला तनाव प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं।
डॉ. चंद्रशेखर ने बताया कि उनकी ओपीडी में करीब 60 प्रतिशत पुरुष और 40 प्रतिशत महिला हृदय रोगी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं में मेनोपॉज के बाद हृदय संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। इसलिए हृदय स्वास्थ्य को केवल 50 वर्ष की उम्र के बाद चिंता का विषय मानना उचित नहीं है।
23 वर्षीय युवा का मामला भी बना चेतावनी
यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा-110 के सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी-कार्डियोलॉजी डॉ. पंकज रंजन ने कहा कि उनकी ओपीडी में हर महीने करीब 700 हृदय संबंधी मरीज आते हैं, जिनमें लगभग 65 प्रतिशत पुरुष और 35 प्रतिशत महिलाएं हैं।
उन्होंने बताया कि अब कम उम्र के मरीजों में भी हृदय संबंधी चिंताएं और जोखिम कारक देखने को मिल रहे हैं। उनके अनुसार एक मामले में 23 वर्षीय युवा को बिना किसी स्पष्ट पारंपरिक जोखिम कारक के बावजूद हृदय संबंधी समस्या सामने आई।
डॉ. रंजन ने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि केवल उम्र के आधार पर हृदय संबंधी जोखिम को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सीने में तकलीफ, सांस फूलना, दिल की धड़कन का तेज या अनियमित होना और असामान्य थकान जैसे लक्षणों पर ध्यान देने की सलाह दी।
हृदय की सेहत के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों के अनुसार हृदय स्वास्थ्य की देखभाल किसी एक उम्र में शुरू करने की बजाय जीवनशैली का हिस्सा बनाना जरूरी है। इसके लिए—
नियमित शारीरिक गतिविधि को दिनचर्या में शामिल करें।
संतुलित और पौष्टिक आहार पर ध्यान दें।
धूम्रपान से बचें।
वजन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित निगरानी करें।
पर्याप्त नींद लेने और तनाव को नियंत्रित करने का प्रयास करें।
परिवार में हृदय रोग का इतिहास होने पर चिकित्सकीय सलाह के अनुसार जांच कराएं।
सीने में दर्द/दबाव, सांस फूलना या अचानक कमजोरी जैसे चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज न करें।
‘डोंट मिस अ बीट’—धड़कन के संकेतों को समझें
आज अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों में हृदय संबंधी जोखिमों को देखते हुए विश्व हृदय दिवस का संदेश केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र से ही स्वस्थ आदतें अपनाना, जोखिम कारकों की पहचान करना और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना हृदय स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल में मदद कर सकता है।
‘डोंट मिस अ बीट’ का संदेश यही है—अपने शरीर के संकेतों को समझें, हृदय संबंधी जोखिमों को पहचानें और चेतावनी संकेत सामने आने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी न करें।
अपने दिल की धड़कन को नजरअंदाज न करें—आज की सावधानी, भविष्य के हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।


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