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वैश्विक साहित्यिक पटल पर डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा का भावपूर्ण एकल काव्य-पाठ


राष्ट्रचेतना, मातृशक्ति और भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के स्वरों से गुंजायमान हुआ साहित्यिक मंच
   मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के वैश्विक साहित्यिक पटल पर प्रतिष्ठित कवि डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा बृजवासी ने अपने ओजस्वी, भावप्रवण और राष्ट्रचेतना से ओतप्रोत एकल काव्य-पाठ से देश-विदेश के साहित्यप्रेमियों को भावविभोर कर दिया। उनके काव्य-पाठ में राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि के प्रति अगाध अनुराग, वीर शहीदों के प्रति कृतज्ञ नमन, मातृशक्ति के गौरव और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रभावशाली समन्वय देखने को मिला।
साहित्यिक आयोजन के दौरान डॉ. शर्मा की काव्याभिव्यक्ति ने श्रोताओं को भावनात्मक रूप से जोड़े रखा। उनकी कविताओं में जहां भारत की पावन माटी और वीरों के बलिदान के प्रति श्रद्धा दिखाई दी, वहीं मातृशक्ति के त्याग, सृजन और परिवार एवं राष्ट्र निर्माण में योगदान को भी प्रभावशाली शब्दों में अभिव्यक्त किया गया।
माँ सरस्वती की वंदना से हुआ काव्य-पाठ का शुभारंभ
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा ने सर्वप्रथम माँ सरस्वती की वंदना कर ज्ञान, वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री शक्ति को नमन किया। इसके पश्चात उन्होंने माँ भारती के चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित काव्य-पाठ का शुभारंभ किया।
उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से भारतीय माटी और देश के वीर सपूतों को नमन करते हुए कहा—
“मस्तक तिलक लगाऊँ अपने माटी हिंदुस्तान की,
पुण्य धरा ये पावन भूमि, वीरों के बलिदान की।”
उनकी इन पंक्तियों में देश की धरती के प्रति श्रद्धा और वीरों के बलिदान के प्रति सम्मान की भावना स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई।
वीर शहीदों को काव्य के माध्यम से नमन
काव्य-पाठ के दौरान डॉ. शर्मा ने भारत के वीर सपूतों की अमर गाथा को स्मरण करते हुए भावपूर्ण स्वर में कहा—
“भारत माँ के बेटों का यशगान सुनाने आया हूँ,
भारत माँ के चरणों में, मैं शीश झुकाने आया हूँ।”
इन पंक्तियों ने साहित्यिक मंच पर राष्ट्रभक्ति और कृतज्ञता का वातावरण और अधिक गहरा कर दिया। श्रोताओं ने भी उनकी काव्याभिव्यक्ति को आत्मीयता के साथ सुना।
मातृशक्ति के गौरव को समर्पित काव्य
डॉ. शर्मा के काव्य-पाठ का एक महत्वपूर्ण पक्ष मातृशक्ति के त्याग, सृजन और गौरव को समर्पित रहा। उन्होंने नारी को परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति बताते हुए कहा—
“करती हो मंगल चार तुम्हीं, बिगड़ा घर तुम्हीं बनाती हो,
है अकथनीय गाथा तुमरी, तुम देश की ज्योति जगाती हो।”
मातृशक्ति को समर्पित इन भावपूर्ण पंक्तियों ने साहित्यिक आयोजन को संवेदनात्मक गहराई प्रदान की।
युवाशक्ति से भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने का आह्वान
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा ने अपने काव्य-पाठ के माध्यम से युवा पीढ़ी का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को भारतीय संस्कृति की महान परंपराओं, जीवन-मूल्यों और ज्ञान-विधाओं को आत्मसात करते हुए उन्हें आधुनिक विश्व के संदर्भ में आगे बढ़ाना चाहिए।
उन्होंने भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान को दिशा देने वाली और भविष्य को आलोकित करने वाली जीवंत चेतना के रूप में प्रस्तुत किया। उनके काव्य में भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता, राष्ट्रीय गौरव और नई पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी का संदेश प्रमुखता से दिखाई दिया।
देश-विदेश के साहित्यकारों की रही सहभागिता
अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के इस वैश्विक साहित्यिक आयोजन में भारत के साथ-साथ विभिन्न देशों से जुड़े साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों की सहभागिता रही।
अमेरिका से अन्नदा पाटनी, सुभाष चंद्र लखेड़ा, डॉ. कौशलेंद्र टिंगी एवं वीणा सिन्हा, कुवैत से संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’, नीदरलैंड्स से विश्वास दुबे, लंदन से आशीष मिश्रा, ऑस्ट्रेलिया से डॉ. भावना कुँवर एवं प्रगीत कुँवर सहित अनेक साहित्यप्रेमी इस आयोजन से जुड़े।
भारत से पंडित सुरेश नीरव, मधु मिश्रा, विनोद भृंग, सेठ सोहनलाल खंडेलवाल, सुभाष चंद्र सैनी, विमल बहुगुणा, दया सिन्हा, बोधिसत्व कस्तूरिया, ब्रह्म देव शर्मा, बबीता प्रसाद प्राची, कविता सक्सेना, सोनिया गोस्वामी शर्मा, प्रमिला श्री तिवारी, के.पी. चौहान, निधि मद्धेशिया, जग नारायण मिश्रा एवं सुनीता माहेश्वरी सहित अनेक साहित्यकारों की सहभागिता रही।
भाषायी और सांस्कृतिक समन्वय को समर्पित संस्था
अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति विविध भारतीय एवं वैश्विक भाषाओं के बीच साहित्यिक समन्वय, सांस्कृतिक संवाद और भाषायी सौहार्द को सुदृढ़ करने की दिशा में सक्रिय है। संस्था के संस्थापक प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं ‘प्रज्ञान पुरुष’ पंडित सुरेश नीरव हैं। संस्था द्वारा हिंदी की बहुराष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका ‘प्रज्ञान विश्वम्’ का प्रकाशन भी किया जाता है।
इस वैश्विक साहित्यिक मंच ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भाषा और साहित्य भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोगों को एक साझा भावभूमि से जोड़ सकते हैं।
कृतज्ञता के साथ हुआ काव्य-पाठ का समापन
काव्य-पाठ के समापन पर डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा ने पंडित सुरेश नीरव, अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति तथा देश-विदेश से जुड़े सभी साहित्यकारों और श्रोताओं के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि इस गौरवपूर्ण वैश्विक साहित्यिक मंच पर काव्य-पाठ का अवसर और साहित्यप्रेमियों का स्नेह उनके लिए अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने भविष्य में भी इसी साहित्यिक परिवार के बीच आत्मीय संवाद और रचनात्मक सहभागिता की आशा व्यक्त की।
डॉ. शर्मा ने साहित्य, भाषा और संस्कृति की इस यात्रा को निरंतर आगे बढ़ाने का आह्वान करते हुए सभी के प्रति सादर प्रणाम, नमन एवं अभिनंदन व्यक्त किया।


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