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बारिश ने खोल दी ग्रेटर नोएडा के ‘औद्योगिक विकास’ की पोल!


सड़कें बनीं तालाब, फैक्ट्रियों में घुसा पानी, मशीनें और कच्चा माल प्रभावित; IBA अध्यक्ष अमित कुमार उपाध्याय बोले—‘थीम पार्क बाद में, पहले सड़क-ड्रेनेज और मूलभूत सुविधाएं दुरुस्त करे प्राधिकरण’

ईकोटेक-3 की बदहाल तस्वीर ने उठाए बड़े सवाल—हर साल बारिश से पहले दावे, पहली बारिश में फिर वही जलभराव
मौहम्मद इल्यास- ‘दनकौरी’ / ग्रेटर नोएडा
Vision Live News/ Special Story 
ग्रेटर नोएडा को देश के प्रमुख औद्योगिक एवं निवेश केंद्रों में विकसित करने के बड़े-बड़े दावों के बीच शुक्रवार को हुई बारिश ने शहर के औद्योगिक क्षेत्रों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। थोड़ी सी बारिश के बाद ही कई स्थानों पर सड़कें तालाब में तब्दील हो गईं और ईकोटेक-3 औद्योगिक क्षेत्र एक बार फिर जलभराव की समस्या से जूझता नजर आया।
उद्योगों के सामने खड़े पानी ने केवल आवागमन की मुश्किलें नहीं बढ़ाईं, बल्कि उत्पादन व्यवस्था, माल ढुलाई और श्रमिकों की आवाजाही तक को प्रभावित किया। इसी स्थिति को लेकर इंडस्ट्रियल बिजनेस एसोसिएशन (IBA) के अध्यक्ष अमित कुमार उपाध्याय ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि अब केवल आश्वासनों और कागजी तैयारियों से काम नहीं चलेगा।
बारिश कुछ देर की, परेशानी पूरे औद्योगिक तंत्र की
अमित कुमार उपाध्याय के मुताबिक, ईकोटेक-3 सहित कई औद्योगिक क्षेत्रों में थोड़ी देर की बारिश के बाद ही सड़कों पर इतना पानी जमा हो जाता है कि पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। कई जगह घुटनों तक पानी भरने की स्थिति बन जाती है।
इस जलभराव का सीधा असर उद्योगों पर पड़ता है। फैक्ट्रियों में पानी प्रवेश करने से मशीनरी, कच्चा माल और तैयार उत्पाद प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। मालवाहक वाहन जलभराव और खराब सड़कों के कारण फंसते हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है और उत्पादन पर भी असर पड़ता है।
सबसे गंभीर स्थिति उन हजारों श्रमिकों और कर्मचारियों की होती है, जिन्हें रोजाना इन औद्योगिक क्षेत्रों में काम के लिए पहुंचना पड़ता है। जलभराव, गड्ढों और टूटी सड़कों के बीच उनका आवागमन दुर्घटना का जोखिम भी बढ़ाता है।
हर साल वही कहानी—बारिश से पहले दावे, बारिश में धराशायी व्यवस्था
IBA अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि हर वर्ष मानसून से पहले नालों की सफाई, ड्रेनेज व्यवस्था सुधारने और जलभराव रोकने की तैयारियों के दावे किए जाते हैं, लेकिन पहली ही अच्छी बारिश के बाद स्थिति फिर जस की तस दिखाई देने लगती है।
उनका कहना है कि यदि वर्षों से किसी औद्योगिक क्षेत्र में जलभराव की समस्या बनी हुई है, तो इसे केवल मौसमी समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह शहरी नियोजन, जलनिकासी और आधारभूत ढांचे की दीर्घकालिक खामी का संकेत है।
थीम पार्क जरूरी है या पहले पानी निकासी?’—उठा प्राथमिकताओं का सवाल
इस पूरे मामले में IBA अध्यक्ष ने एक ऐसा सवाल उठाया है, जो अब ग्रेटर नोएडा के विकास मॉडल की प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि जब औद्योगिक और आवासीय क्षेत्रों में सड़क, ड्रेनेज, स्ट्रीट लाइट और साफ नालों जैसी मूलभूत सुविधाएं अभी भी अपेक्षित स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं, तो करोड़ों रुपये थीम पार्क, सौंदर्यीकरण और अन्य गैर-प्राथमिकता वाली परियोजनाओं पर खर्च करने का औचित्य क्या है?
उनके मुताबिक विकास का पहला पैमाना यह होना चाहिए कि जिस क्षेत्र में उद्योग स्थापित हैं, वहां उद्यमी, कर्मचारी और आम नागरिक सुरक्षित एवं सुगम तरीके से आवागमन कर सकें।
यानी सवाल थीम पार्क के विरोध का नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकता तय करने का है।
उद्यमी राजस्व देते हैं, बदले में आधारभूत सुविधाएं क्यों नहीं?
अमित कुमार उपाध्याय ने कहा कि उद्यमी लीज रेंट, ट्रांसफर चार्ज और अन्य शुल्कों के माध्यम से प्राधिकरण के राजस्व में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ऐसे में औद्योगिक क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निवेश के प्रति भरोसा बनाए रखने की आवश्यकता भी है।
उनका कहना है कि उद्यमियों को ऐसी सड़कें चाहिए जो बारिश में जलमग्न न हों, ऐसी ड्रेनेज व्यवस्था चाहिए जो वास्तविक क्षमता के साथ काम करे, नालों की नियमित सफाई हो और स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाएं लगातार दुरुस्त रहें।
जलभराव सिर्फ पानी नहीं—उद्योगों की लागत और निवेश के भरोसे का सवाल
IBA अध्यक्ष ने इस समस्या को केवल स्थानीय जलभराव तक सीमित न रखते हुए इसे निवेश और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा से जोड़ते हुए बड़ा सवाल खड़ा किया।
उन्होंने कहा कि देश 'विकसित भारत-2047', 'ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था' और वैश्विक निवेश की दिशा में आगे बढ़ने की बात कर रहा है। ऐसे समय में यदि किसी संभावित निवेशक को औद्योगिक क्षेत्र में पहली ही बारिश के बाद जलमग्न सड़कें, फैक्ट्रियों में पानी और खराब आधारभूत ढांचा दिखाई देगा, तो उसके मन में निवेश को लेकर विश्वास कैसे पैदा होगा?
औद्योगिक विकास केवल जमीन आवंटित करने और फैक्ट्री लगाने से नहीं होता; उसके लिए विश्वसनीय आधारभूत ढांचा भी जरूरी है।
IBA ने रखी समयबद्ध समाधान की मांग
इंडस्ट्रियल बिजनेस एसोसिएशन ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से जलभराव की समस्या के स्थायी समाधान के लिए समयबद्ध कार्ययोजना सार्वजनिक करने की मांग की है।
एसोसिएशन की प्रमुख मांगों में—
सभी प्रमुख नालों और ड्रेनेज लाइनों की तत्काल सफाई,
जलभराव वाले स्थानों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान,
क्षतिग्रस्त एवं गड्ढायुक्त सड़कों का पुनर्निर्माण,
औद्योगिक क्षेत्रों में प्रभावी जलनिकासी व्यवस्था,
स्ट्रीट लाइट व्यवस्था को दुरुस्त करना,
मानसून से पहले और बाद में ड्रेनेज का नियमित निरीक्षण,
तथा लापरवाही के लिए जिम्मेदारी तय करना शामिल है।
‘आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए’
अमित कुमार उपाध्याय ने कहा कि अब उद्यमियों को बार-बार दिए जाने वाले आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम चाहिए।
उन्होंने कहा, “उद्योग सुरक्षित रहेंगे, तभी निवेश आएगा, रोजगार बढ़ेगा और विकसित भारत का सपना साकार होगा। अब समय आ गया है कि प्राधिकरण दिखावटी विकास के बजाय धरातल पर दिखाई देने वाला विकास करे।”
विशेष टिप्पणी
ग्रेटर नोएडा की पहचान तेजी से बढ़ते औद्योगिक और निवेश केंद्र के रूप में बनाई जा रही है। ऐसे में बारिश के दौरान सामने आने वाली जलभराव, टूटी सड़क और ड्रेनेज की समस्याएं महज स्थानीय असुविधा नहीं हैं। ये शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल की परीक्षा भी हैं।
बारिश हर साल होगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर साल उद्योगों को उसी जलभराव का सामना करना पड़ेगा?
ग्रेटर नोएडा के विकास की असली कसौटी अब बड़ी परियोजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि यह होनी चाहिए कि बारिश के बाद भी उद्योग कितनी आसानी से चलते हैं और श्रमिक कितनी सुरक्षित तरीके से अपने कार्यस्थल तक पहुंचते हैं।


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