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ईकोटेक-3 में पानी का सैलाब या सिस्टम की नाकामी? 1650 उद्योगों के बीच ‘दो पंप’ से जल निकासी का दावा, IBA ने खोली व्यवस्था की पोल


हर मानसून से पहले वादे और तैयारियों के दावे, बारिश आते ही सड़कें और फैक्ट्रियां जलमग्न—IBA का सवाल: आखिर कब तक उद्यमी भरेंगे लापरवाही की कीमत ?
मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/  ग्रेटर नोएडा
Vision Live News / Special Story 
ग्रेटर नोएडा को देश के आधुनिक औद्योगिक शहरों में शामिल करने के दावे भले ही लगातार किए जाते हों, लेकिन मानसून की बारिश ने एक बार फिर ईकोटेक-3 की जमीनी हकीकत सामने ला दी है। जिस औद्योगिक क्षेत्र में 1650 से अधिक औद्योगिक इकाइयां स्थापित हैं, जहां करोड़ों रुपये का निवेश, हजारों लोगों का रोजगार और बड़े पैमाने पर उत्पादन जुड़ा हुआ है, वहां भारी बारिश के बाद जल निकासी की व्यवस्था पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ईकोटेक-3 में पानी क्यों भर गया। असली सवाल यह है कि वर्षों से समस्या की जानकारी होने के बावजूद इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ?
और उससे भी बड़ा सवाल—यदि इतने बड़े औद्योगिक क्षेत्र की जल निकासी के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तो हर साल मानसून से पहले तैयारियों के दावे आखिर किस आधार पर किए जाते हैं?
इंडस्ट्रियल बिजनेस एसोसिएशन (IBA) ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए गौतमबुद्ध नगर औद्योगिक विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली और जल निकासी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
बारिश ने नहीं, जल निकासी की बदइंतजामी ने बढ़ाई मुसीबत
बारिश प्राकृतिक घटना है, लेकिन औद्योगिक क्षेत्र में पानी का घंटों या दिनों तक जमा रहना केवल मौसम की मार नहीं माना जा सकता। औद्योगिक क्षेत्रों में ड्रेनेज, पंपिंग और आपातकालीन जल निकासी की व्यवस्था इसी संभावना को ध्यान में रखकर तैयार की जाती है।
IBA का आरोप है कि ईकोटेक-3 में वर्षों से जलभराव की समस्या सामने आती रही है। हर बार मानसून से पहले स्थिति सुधारने और जलभराव रोकने के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन बारिश होते ही तस्वीर फिर वही दिखाई देती है।
यानी समस्या नई नहीं है—लेकिन समाधान आज भी अधूरा है।
उद्योग केंद्र-2: पानी फंसा, रास्ते बंद और निकासी का सवाल अनुत्तरित
ईकोटेक-3 के उद्योग केंद्र-2 की स्थिति को IBA ने विशेष रूप से गंभीर बताया है।
एसोसिएशन के अनुसार इस क्षेत्र में बारिश के पानी की निकासी के लिए कोई प्रभावी एवं स्थायी व्यवस्था दिखाई नहीं देती। रिवर इंजीनियरिंग की ओर जाने वाले मार्ग पर आरसीसी ड्रेन निर्माण और सड़क की मौजूदा ढाल के कारण पानी उस दिशा में अपेक्षित रूप से प्रवाहित नहीं हो पा रहा है।
दूसरी ओर पुलिस लाइन की तरफ स्थित नाला पहले से ही अवरुद्ध और ओवरफ्लो बताया जा रहा है। हालात इतने खराब बताए जा रहे हैं कि पुलिस लाइन परिसर भी जलभराव की चपेट में है।
ऐसे में उद्योग केंद्र-2 के सामने सबसे बुनियादी सवाल खड़ा हो गया है—
“पानी निकलेगा तो निकलेगा कहां से?”
यदि एक तरफ पानी जाने का रास्ता प्रभावी नहीं है और दूसरी तरफ नाला पहले से ही ओवरफ्लो है, तो बारिश का पानी स्वाभाविक रूप से उन्हीं स्थानों पर जमा होगा जहां उद्योग और सड़कें स्थित हैं।
डीएससी रोड के बड़े नाले आखिर किस काम के?
IBA ने जल निकासी की पूरी व्यवस्था की कड़ी पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
एसोसिएशन का सवाल है कि डीएससी रोड पर बड़े नाले और कल्वर्ट बनाए गए हैं, लेकिन यदि उद्योग केंद्र-2 के भीतर जमा पानी को उन मुख्य ड्रेनेज प्वाइंट तक पहुंचाने का प्रभावी रास्ता ही नहीं है, तो उन बड़े नालों का वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा?
बड़ा नाला बनाना पर्याप्त है या पानी को वहां तक पहुंचाना भी जरूरी है?
यही वह तकनीकी सवाल है जिस पर अब प्राधिकरण को जवाब देना होगा।
क्योंकि जल निकासी केवल नाला बनाने का नाम नहीं है। इसके लिए सही ढाल, पर्याप्त क्षमता, कनेक्टिविटी, नियमित सफाई और आवश्यकता पड़ने पर पंपिंग सिस्टम की पूरी श्रृंखला जरूरी होती है।
1650 से ज्यादा उद्योग और जल निकासी के लिए सिर्फ दो छोटे पंप!
IBA द्वारा उठाया गया सबसे गंभीर सवाल आपातकालीन डी-वॉटरिंग व्यवस्था को लेकर है।
एसोसिएशन के अनुसार लगभग 1650 से अधिक औद्योगिक इकाइयों वाले ईकोटेक-3 जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र में जल निकासी के लिए केवल दो छोटे क्षमता वाले पंपों के सहारे स्थिति संभालने का प्रयास किया जा रहा है।
यदि यह व्यवस्था वास्तव में इतनी ही सीमित है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या इतने बड़े औद्योगिक क्षेत्र के लिए यह पर्याप्त क्षमता है?
भारी बारिश के दौरान कुछ ही घंटों में हजारों वर्गमीटर क्षेत्र में पानी जमा हो सकता है। ऐसे में दो सीमित क्षमता वाले पंपों से पूरे औद्योगिक क्षेत्र का पानी निकालने की कोशिश कितनी प्रभावी होगी, इसका अंदाजा मौजूदा स्थिति से लगाया जा सकता है।
IBA का कहना है कि कम से कम 10 से 15 उच्च क्षमता वाले डी-वॉटरिंग पंप तत्काल लगाए जाने चाहिए।
IBA ने पहले चेताया, फिर भी तैयारी क्यों नहीं हुई?
इस पूरे मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि IBA का कहना है कि उसने मानसून शुरू होने से पहले ही प्राधिकरण के अधिकारियों को संभावित जलभराव की समस्या से अवगत कराया था।
एसोसिएशन के अनुसार अधिकारियों को लिखित और मौखिक रूप से आग्रह किया गया था कि पर्याप्त संख्या में उच्च क्षमता वाले डी-वॉटरिंग पंप पहले से तैयार रखे जाएं।
यानी दावा यह है कि समस्या अचानक सामने नहीं आई थी।
जब पहले से खतरे की जानकारी थी, तब पर्याप्त पंप, वैकल्पिक जल निकासी मार्ग और आपातकालीन व्यवस्था क्यों नहीं तैयार की गई—यह सवाल अब सीधे प्राधिकरण की तैयारियों पर जाता है।
पानी सड़क पर नहीं रुका, उद्योगों के अंदर घुस गया
जलभराव की असली कीमत तब सामने आती है जब पानी औद्योगिक परिसरों के भीतर पहुंचता है।
IBA के अनुसार कई औद्योगिक इकाइयों में पानी प्रवेश कर चुका है। इससे मशीनरी, कच्चे माल, तैयार उत्पाद और अन्य परिसंपत्तियों को नुकसान पहुंचने की स्थिति बनी है।
किसी उद्योग के लिए मशीनरी का नुकसान केवल एक उपकरण का नुकसान नहीं होता। मशीन बंद होने का अर्थ है उत्पादन प्रभावित होना, ऑर्डर प्रभावित होना, कर्मचारियों का काम प्रभावित होना और कारोबारी नुकसान बढ़ना।
यदि तैयार माल पानी में खराब होता है तो उसका सीधा आर्थिक नुकसान होता है। यदि मशीनरी प्रभावित होती है तो मरम्मत या प्रतिस्थापन की अतिरिक्त लागत सामने आती है।
बारिश कुछ घंटे की, लेकिन नुकसान की भरपाई महीनों तक चल सकती है।
यह सिर्फ पानी नहीं, रोजगार और निवेश का सवाल है
ईकोटेक-3 में स्थापित औद्योगिक इकाइयों से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगों पर निर्भर है।
ऐसे में बार-बार होने वाला जलभराव केवल उद्यमियों की समस्या बताकर खत्म नहीं किया जा सकता।
यदि जलभराव के कारण उत्पादन रुकता है, तो उसका प्रभाव—
उद्योग → कर्मचारी → सप्लायर → ट्रांसपोर्टर → ग्राहक → स्थानीय अर्थव्यवस्था
तक पहुंचता है।
इसलिए औद्योगिक क्षेत्र की जल निकासी को केवल स्थानीय सफाई या मानसून प्रबंधन का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा।
एक तरफ पूरी वसूली, दूसरी तरफ मूलभूत सुविधा पर सवाल
IBA ने प्राधिकरण की राजस्व वसूली व्यवस्था को लेकर भी तीखी टिप्पणी की है।
एसोसिएशन का कहना है कि उद्यमियों से लीज रेंट, ब्याज, ट्रांसफर शुल्क और अन्य देयकों की वसूली में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाती।
ऐसे में उद्यमियों का सवाल है कि जब वित्तीय दायित्वों की वसूली समय पर और कठोरता से की जाती है, तो उद्योगों को सुरक्षित एवं कार्यक्षम बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से क्यों नहीं निभाई जानी चाहिए?
उद्यमी पैसा दें, उद्योग लगाएं, रोजगार दें और फिर जलभराव का नुकसान भी खुद उठाएं—क्या यही औद्योगिक विकास का मॉडल है?
IBA के बयान ने इसी सवाल को केंद्र में ला दिया है।
‘हर साल आश्वासन, हर साल जलभराव’—अब यह सिलसिला रोकना होगा
सबसे बड़ा आक्रोश इस बात को लेकर है कि समस्या बार-बार सामने आने के बावजूद इसका स्थायी समाधान नहीं हुआ।
मानसून से पहले तैयारियां होती हैं।
बैठकें होती हैं।
आश्वासन दिए जाते हैं।
लेकिन बारिश के बाद फिर पंप लगाए जाते हैं, पानी निकाला जाता है और कुछ समय बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
फिर अगला मानसून आता है और कहानी दोबारा शुरू हो जाती है।
क्या जल निकासी व्यवस्था भी हर साल ‘इमरजेंसी मोड’ में ही चलेगी?
IBA का कहना है कि अब इस अस्थायी व्यवस्था से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की जरूरत है।
10-15 हाई कैपेसिटी पंप से लेकर स्थायी ड्रेनेज नेटवर्क तक मांग
IBA ने तत्काल राहत और दीर्घकालिक समाधान दोनों की मांग की है।
तत्काल कदम
ईकोटेक-3 में कम से कम 10 से 15 उच्च क्षमता वाले डी-वॉटरिंग पंप लगाए जाएं।
जलभराव वाले स्थानों पर अतिरिक्त पंपिंग पॉइंट बनाए जाएं।
नालों और कल्वर्ट की तत्काल सफाई कराई जाए।
अवरुद्ध ड्रेनेज लाइन को खोला जाए।
उद्योगों के प्रवेश मार्गों पर पानी की निकासी सुनिश्चित की जाए।
स्थायी समाधान
पूरे ईकोटेक-3 का तकनीकी ड्रेनेज ऑडिट कराया जाए।
सड़क और नालों की ढाल का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए।
उद्योग केंद्र-2 के लिए प्रभावी आउटलेट विकसित किया जाए।
आरसीसी ड्रेनेज नेटवर्क को मुख्य नालों से जोड़ा जाए।
भविष्य की बारिश की क्षमता को ध्यान में रखते हुए ड्रेनेज की डिजाइन क्षमता निर्धारित की जाए।
नियमित प्री-मानसून ड्रेन सफाई और निरीक्षण की व्यवस्था बनाई जाए।
अब नुकसान का हिसाब भी होगा
IBA ने इस बार मामले को केवल मांग और शिकायत तक सीमित नहीं रखने का संकेत दिया है।
एसोसिएशन के मुताबिक जलभराव से जिन उद्यमियों को आर्थिक नुकसान हुआ है, वे नुकसान का विधिवत आकलन करेंगे और उसे गौतमबुद्ध नगर औद्योगिक विकास प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर क्षतिपूर्ति की मांग करेंगे।
यह घोषणा आने वाले दिनों में इस मुद्दे को और गंभीर बना सकती है।
क्योंकि अब सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि पानी कब निकलेगा।
सवाल यह भी होगा कि नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
आंदोलन की चेतावनी, लेकिन लोकतांत्रिक रास्ते से
IBA ने स्पष्ट किया है कि यदि तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो एसोसिएशन उद्यमियों के साथ लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण आंदोलन करने के लिए बाध्य होगी।
एसोसिएशन का कहना है कि हर साल प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा उद्योगों को भुगतना स्वीकार नहीं किया जाएगा।
यह चेतावनी आने वाले समय में ईकोटेक-3 के उद्यमियों को एकजुट कर सकती है।
अब असली परीक्षा प्राधिकरण की
ईकोटेक-3 की मौजूदा स्थिति ने प्राधिकरण के सामने कई सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं—
जब समस्या हर साल सामने आती है तो स्थायी समाधान क्यों नहीं?
जब मानसून का पूर्वानुमान रहता है तो पर्याप्त डी-वॉटरिंग पंप पहले से क्यों नहीं?
यदि मुख्य नाले मौजूद हैं तो उद्योग केंद्र-2 का पानी वहां तक पहुंचाने का प्रभावी नेटवर्क कहां है?
यदि नालों की क्षमता पर्याप्त है तो ओवरफ्लो की स्थिति क्यों बन रही है?
और यदि उद्यमियों को आर्थिक नुकसान होता है तो उसकी जवाबदेही कौन तय करेगा?
इन सवालों का जवाब अब केवल आश्वासन से नहीं चलेगा।
ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक मॉडल के लिए भी चेतावनी
ईकोटेक-3 की समस्या को व्यापक संदर्भ में देखें तो यह ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक विकास मॉडल के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।
नए उद्योगों को जमीन उपलब्ध कराना और निवेश आकर्षित करना विकास का पहला चरण है। लेकिन निवेश को सुरक्षित रखना, उद्योगों को निर्बाध संचालन की सुविधा देना और बुनियादी ढांचे को भविष्य की जरूरत के अनुरूप बनाना उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि औद्योगिक क्षेत्र में भारी बारिश के दौरान पानी निकासी का संकट पैदा होता है, तो इसका असर निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ सकता है।
अब आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए
ईकोटेक-3 में जमा पानी धीरे-धीरे उतर जाएगा। सड़कें भी साफ हो जाएंगी। उद्योग दोबारा चलने लगेंगे। लेकिन असली सवाल वहीं रहेगा—
अगली बारिश में फिर यही होगा या नहीं?
यदि जवाब फिर वही है कि पंप लगा दिए जाएंगे और पानी निकाल दिया जाएगा, तो समस्या का समाधान नहीं हुआ।
समाधान तब होगा जब ऐसी व्यवस्था बने कि भारी बारिश के बावजूद औद्योगिक इकाइयों के भीतर पानी न पहुंचे और जल निकासी स्वतः प्रभावी ढंग से हो।
IBA ने अपनी ओर से गेंद प्राधिकरण के पाले में डाल दी है। अब देखना यह है कि प्राधिकरण इसे एक और मानसूनी शिकायत मानता है या 1650 से अधिक औद्योगिक इकाइयों की सुरक्षा, निवेश और रोजगार से जुड़े गंभीर बुनियादी ढांचे के संकट के रूप में लेकर स्थायी कार्रवाई करता है।
क्योंकि अब मुद्दा सिर्फ ईकोटेक-3 में पानी भरने का नहीं है—मुद्दा यह है कि औद्योगिक विकास के नाम पर किए जा रहे दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं की जवाबदेही कौन तय करेगा?


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