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राममय हुआ कलुपुरा, श्रद्धा और राष्ट्रचेतना के साथ मनाई गई गोस्वामी तुलसीदास जयंती


तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाए सत्य, मर्यादा, सेवा और लोकमंगल के संदेश
     मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ कलुपुरा (गौतमबुद्धनगर)
मानस अवलोकन संस्था, कलुपुरा के तत्वावधान में बौद्ध मिशन कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कालूपुरा में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रद्धा, भक्ति, आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रभावना के साथ भव्य रूप से मनाई गई। कार्यक्रम में संत-महात्माओं, विद्वानों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों तथा क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता की और तुलसीदास जी के जीवन, कृतित्व एवं लोकमंगलकारी विचारों को याद किया।
कार्यक्रम के दौरान संत-महात्माओं एवं विद्वानों ने श्रीराम नाम की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम की भक्ति मनुष्य के जीवन में सत्य, मर्यादा, करुणा, त्याग, कर्तव्य, विनम्रता और सेवा जैसे सद्गुणों का संचार करती है। वक्ताओं ने कहा कि भगवान अपने भक्तों की उसी प्रकार रक्षा करते हैं, जिस प्रकार माता अपने अबोध शिशु की निरंतर चिंता और संरक्षण करती है।
भारतीय संस्कृति के अमर प्रहरी थे तुलसीदास
वक्ताओं ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास केवल महान भक्त और कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के अमर प्रहरी थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों और जीवन के संघर्षों के बावजूद धर्म, भक्ति और लोककल्याण का मार्ग नहीं छोड़ा। श्रीरामचरितमानस के माध्यम से उन्होंने भगवान श्रीराम के आदर्श चरित्र को जन-जन तक पहुंचाया और समाज को सत्य, धर्म, कर्तव्य, करुणा, त्याग, विनम्रता तथा परोपकार की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि तुलसीदास जी के जीवन-दर्शन में श्रीराम मर्यादा, सत्यनिष्ठा, न्याय, वचनबद्धता और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। उनका प्रसिद्ध संदेश “परहित सरिस धरम नहि दूजा” मानव जीवन की सार्थकता को परिभाषित करता है। इसका भाव है कि दूसरों के हित और कल्याण से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है।
वक्ताओं ने कहा कि इसी कारण श्रीरामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय समाज के जीवन-मूल्यों, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना का अमूल्य लोकग्रंथ है।
राष्ट्र सर्वोपरि की भावना का दिया संदेश
कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति और राष्ट्रधर्म पर भी विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि भारत की संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संस्कृति है और देश सदैव शांति, सद्भाव एवं विश्वबंधुत्व का संदेश देता रहा है। साथ ही राष्ट्र की सुरक्षा, संप्रभुता, अखंडता और गौरव की रक्षा प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है।
उन्होंने कहा कि “राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना प्रत्येक भारतीय के हृदय में दृढ़ होनी चाहिए। मातृभूमि की आन, बान और शान तथा देश की महान सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए प्रत्येक नागरिक को सदैव तत्पर रहना चाहिए। राष्ट्रहित में आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च त्याग के लिए तैयार रहना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
27 वर्षों से संस्कृति और संस्कारों के लिए कार्य कर रही संस्था
मानस अवलोकन संस्था के महासचिव हरिओम शास्त्री ने बताया कि संस्था पिछले 27 वर्षों से राष्ट्रहित और समाजहित में भारतीय संस्कृति, संस्कारों और जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रही है। धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से संस्था देश की गौरवशाली परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने का निरंतर प्रयास कर रही है।
संस्था के संयोजक संजय विमल देव ने कहा कि संस्था विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी के चरित्र निर्माण, संस्कार विकास एवं सर्वांगीण उन्नयन को लेकर कार्य कर रही है। आज के विद्यार्थी ही भविष्य के भारत के निर्माता हैं। इसलिए उन्हें महापुरुषों के जीवन, संघर्ष और आदर्शों से परिचित कराकर राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए तैयार करना संस्था का प्रमुख उद्देश्य है।
उन्होंने बताया कि संस्था के कार्यालय में विद्यार्थियों द्वारा नियमित रूप से श्रीरामचरितमानस का पाठ किया जाता है। इसके अलावा प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को श्रीसुंदरकांड का पाठ आयोजित किया जाता है। सत्संग के माध्यम से युवाओं को महापुरुषों के जीवन-चरित्र, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा दी जाती है।
संस्था द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए सहायता राशि उपलब्ध कराकर उनके भविष्य को संवारने का भी प्रयास किया जा रहा है।
राममय हुआ कार्यक्रम स्थल
जयंती समारोह के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय और राममय नजर आया। श्रद्धालुओं एवं विद्यार्थियों ने श्रीराम के जयघोष के साथ तुलसीदास जी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित संत-महात्माओं, विद्यार्थियों, श्रद्धालुओं एवं गणमान्य नागरिकों ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्र की एकता-अखंडता, सामाजिक सद्भाव, लोककल्याण और राष्ट्रसेवा के मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि तुलसीदास जी की रचनाएं आज भी समाज को संस्कार, सद्भाव, मर्यादा और लोकमंगल की दिशा दिखाने में उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।

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