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चुनावी बरसात शुरू... पोस्टरों के जंगल में फिर खिल उठे 'जनसेवक'!



पांच साल खामोशी, चुनाव आते ही जनसेवा की याद!

मौहम्मद इल्यास 'दनकौरी'

संपादक, विजन लाइव

कहते हैं कि प्रकृति के अपने नियम होते हैं। गर्मी के बाद बरसात आती है, बरसात में मेंढक टर्राते हैं और चुनाव आते ही नेताओं की सक्रियता अचानक कई गुना बढ़ जाती है। यह ऐसा प्राकृतिक चक्र है, जिस पर शायद मौसम विभाग भी शोध करना चाहे।

अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान भी नहीं हुआ है, लेकिन गौतम बुद्ध नगर की राजनीति में चुनावी सुगबुगाहट साफ दिखाई देने लगी है। शहर की दीवारें, चौराहे, फ्लाईओवर और बाजार बड़े-बड़े होर्डिंगों से सजने लगे हैं। जिन चेहरों को जनता ने पिछले पांच वर्षों में मुश्किल से देखा होगा, वे अब हर मोड़ पर मुस्कुराते हुए दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लगता है मानो जनसेवा का प्रेम अचानक उमड़ पड़ा हो।

राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिनकी सक्रियता का कैलेंडर बड़ा दिलचस्प होता है। चुनाव खत्म... तो जनसेवा भी खत्म। पांच साल तक जनता अपनी समस्याओं के साथ सरकारी दफ्तरों और जनप्रतिनिधियों के चक्कर लगाती रहती है, लेकिन चुनाव आते ही वही नेता हर गली, हर गांव और हर चौपाल पर सहज उपलब्ध हो जाते हैं। जनता भी मन ही मन सोचती है—"काश चुनाव हर साल होते, तो शायद हमारी समस्याएं भी जल्दी सुन ली जातीं।"

गौतम बुद्ध नगर में भी चुनावी मौसम ने अपनी दस्तक दे दी है। दादरी, जेवर और नोएडा विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक हलचल तेज हो रही है। कई छोटे-बड़े दल, जो सामान्य दिनों में राजनीतिक दृश्य से लगभग गायब रहते हैं, अब पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर आए हैं। प्रेस वार्ताएं, स्वागत समारोह, सदस्यता अभियान, जनसंपर्क यात्राएं और सोशल मीडिया पर अचानक आई सक्रियता बता रही है कि चुनाव अब दूर नहीं।

सबसे अधिक रौनक होर्डिंग उद्योग में दिखाई देती है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्योहार फ्लेक्स प्रिंटिंग वालों के लिए ही आता हो। हर चौराहे पर किसी का जन्मदिन, किसी का स्वागत, किसी की बधाई और किसी का "जनसेवा का संकल्प" टंगा दिखाई देता है। पोस्टरों की संख्या देखकर कभी-कभी भ्रम हो जाता है कि चुनाव हो रहा है या विज्ञापन महोत्सव।

लेकिन अब जनता भी पहले वाली नहीं रही। अब मतदाता केवल मुस्कुराती तस्वीरों, बड़े-बड़े नारों और भावनात्मक भाषणों से प्रभावित नहीं होता। वह सीधा सवाल पूछता है—जब गांव में सड़क टूटी थी, किसान आंदोलन कर रहे थे, युवाओं को रोजगार चाहिए था, व्यापारियों की समस्याएं थीं और आम आदमी परेशान था, तब आपकी राजनीति कहां थी?

लोकतंत्र में चुनाव जनता का सबसे बड़ा अधिकार है, लेकिन उससे भी बड़ा अधिकार है सवाल पूछना। जनता अब वोट देने से पहले पांच वर्षों का रिपोर्ट कार्ड देखना चाहती है। वह जानना चाहती है कि किसने केवल पोस्टर लगाए और किसने वास्तव में लोगों के बीच रहकर काम किया।

विजन लाइव विश्लेषण

लोकतंत्र में चुनावी सक्रियता स्वाभाविक है, लेकिन यदि राजनीतिक दलों और नेताओं की सक्रियता केवल चुनाव तक सीमित रह जाए, तो यह लोकतंत्र की भावना पर भी सवाल खड़े करती है। जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन उसके चुनावी भाषणों से नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल की जवाबदेही, उपलब्धता और जनहित में किए गए कार्यों से होना चाहिए।

गौतम बुद्ध नगर का मतदाता अब पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह जाति, धर्म, पोस्टर और प्रचार से आगे बढ़कर विकास, पारदर्शिता और जनसेवा को महत्व देने लगा है। यही कारण है कि इस बार चुनावी होर्डिंगों से अधिक चर्चा नेताओं के पांच वर्षों के कामकाज की होगी।

याद रखिए... जनता सब देखती है।
होर्डिंग हवा से हिलते हैं, लेकिन जनता का फैसला काम से बदलता है।
चुनावी मौसम हर पांच साल में आता है, लेकिन जनता का फैसला इतिहास बना देता है।
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