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ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान: 'नौशेरा का शेर'—जिसने आर्मी चीफ बनने का प्रस्ताव ठुकराकर भारत माता की सेवा को चुना, 114वीं जयंती पर विशेष



लेखक : चौधरी शौकत अली चेची
(सामाजिक चिंतक, लेखक एवं समसामयिक विषयों के विश्लेषक)
भारत का इतिहास ऐसे वीर सपूतों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वाभिमान की रक्षा की। इन अमर सेनानायकों में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, महावीर चक्र का नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। भारतीय सेना के इस जांबाज़ अधिकारी ने न केवल रणभूमि में असाधारण वीरता का परिचय दिया, बल्कि अपने जीवन से यह भी सिद्ध किया कि राष्ट्रभक्ति किसी जाति, धर्म या भाषा की मोहताज नहीं होती।
'नौशेरा का शेर' के नाम से विख्यात ब्रिगेडियर उस्मान ने 1947–48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। पाकिस्तान द्वारा दिए गए उच्च पद के प्रलोभन को ठुकराकर उन्होंने भारत के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखा और अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की। उनका जीवन आज भी भारतीय सैनिकों और देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के बीबीपुर गांव में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद फारूक पुलिस विभाग में अधिकारी थे, जबकि माता जमीलून बीबी एक संस्कारी एवं शिक्षित परिवार से थीं। परिवार में तीन बड़ी बहनें तथा दो छोटे भाई थे। उनके छोटे भाई मोहम्मद सुहान बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े प्रतिष्ठित पत्रकार बने, जबकि दूसरे भाई मोहम्मद गुफरान भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद तक पहुँचे।
बचपन से ही उस्मान साहसी, अनुशासित और संवेदनशील स्वभाव के थे। कहा जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने एक कुएँ में कूदकर डूब रहे बच्चे की जान बचाई थी। यह घटना उनके निडर व्यक्तित्व की प्रारंभिक झलक मानी जाती है।
शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण
प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में प्राप्त करने के बाद उनका चयन ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री अकादमी, सैंडहर्स्ट में हुआ। उस दौर में किसी भारतीय युवक का इस संस्थान तक पहुँचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
वर्ष 1934 में उन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त हुआ और उनकी नियुक्ति 10वीं बलूच रेजिमेंट में हुई। अपने सैन्य जीवन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और उत्कृष्ट रणनीतिक कौशल का परिचय दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी उन्होंने विभिन्न मोर्चों पर उल्लेखनीय सेवाएँ दीं और अपने वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास अर्जित किया।
देश विभाजन और जीवन का सबसे बड़ा निर्णय
सन् 1947 में भारत के विभाजन के समय अनेक सैन्य अधिकारियों के सामने भारत या पाकिस्तान में से किसी एक देश की सेना चुनने का विकल्प था। उस समय ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान एक कुशल, अनुभवी और सम्मानित सैन्य अधिकारी के रूप में पहचाने जाते थे।
लोकप्रिय विवरणों के अनुसार, पाकिस्तान की ओर से उन्हें अपनी सेना में शामिल होने तथा भविष्य में सर्वोच्च सैन्य पद देने का प्रस्ताव भी मिला। किंतु ब्रिगेडियर उस्मान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि जिस भूमि पर उनके पूर्वजों ने जीवन बिताया, वही उनकी मातृभूमि है और उसकी रक्षा करना उनका सर्वोच्च कर्तव्य है।
भारत को चुनने का यह निर्णय केवल एक सैनिक का निर्णय नहीं था, बल्कि राष्ट्र के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और कर्तव्यबोध का प्रतीक था। विभाजन के बाद उनकी नियुक्ति भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट में हुई और उन्होंने पूरे समर्पण के साथ अपनी सेवाएँ जारी रखीं।
कश्मीर युद्ध और नई जिम्मेदारी
स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ ही महीनों बाद जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों और पाकिस्तानी सैनिकों ने आक्रमण कर दिया। यह स्वतंत्र भारत के सामने पहली बड़ी सैन्य चुनौती थी।
राजौरी, झंगर और नौशेरा क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। प्रारंभिक संघर्षों में भारतीय सेना को कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। इसी दौरान परिस्थितियों ने ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को अग्रिम मोर्चे पर नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी।
उन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सैनिकों का मनोबल ऊँचा बनाए रखा। वे केवल आदेश देने वाले अधिकारी नहीं थे, बल्कि सैनिकों के साथ अग्रिम मोर्चे पर रहकर नेतृत्व करने में विश्वास रखते थे। यही गुण उन्हें अपने साथियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाता था।
आगे चलकर नौशेरा और झंगर की लड़ाइयों में उनके नेतृत्व ने भारतीय सेना के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ा और उन्हें पूरे देश में 'नौशेरा का शेर' के नाम से सम्मान मिला।
अगले भाग में नौशेरा और झंगर की निर्णायक लड़ाई, उन पर लगे संदेहों के बीच उनका नेतृत्व, उनकी शहादत तथा राष्ट्रीय सम्मान का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया जाएगा।
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