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सिकल सेल रोग: समय पर पहचान और उपचार से बचाई जा सकती हैं जिंदगियां


मौहम्मद इल्यास-‘दनकौरी’/ ग्रेटर नोएडा

सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease - SCD) एक गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार है, जो जीवनभर स्वास्थ्य को प्रभावित करने के साथ-साथ कई जटिलताओं के कारण एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। यह रोग हीमोग्लोबिन को प्रभावित करता है, जो शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य गोल आकार के बजाय दरांती (सिकल) के आकार की हो जाती हैं, जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है और एनीमिया, बार-बार दर्द के दौरे, संक्रमण तथा महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि उपचार के क्षेत्र में प्रगति के बावजूद इस बीमारी के प्रति जागरूकता और समय पर पहचान अत्यंत आवश्यक है। बिना किसी स्पष्ट कारण के एनीमिया, पीलिया, हाथ-पैरों में सूजन, बार-बार संक्रमण, अत्यधिक थकान और बच्चों में विकास की धीमी गति जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विशेष रूप से नवजात शिशुओं और बच्चों में समय पर जांच एवं उचित उपचार से न केवल जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है, बल्कि गंभीर जटिलताओं के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।

यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन में सीनियर कंसलटेंट एंड रीजनल डायरेक्टर डॉ. तरुण वर्मा के अनुसार, “सिकल सेल रोग हीमोग्लोबिनोपैथी समूह का एक आनुवंशिक विकार है, जिसमें या तो हीमोग्लोबिन का उत्पादन कम होता है या यह दोषपूर्ण होता है। इस स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं दरांती के आकार की हो जाती हैं, जिससे रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और मरीज को एनीमिया, तीव्र दर्द के दौरे तथा अंगों को नुकसान जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि यह रोग आज भी एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चिंता बना हुआ है।”

उन्होंने बताया कि इस रोग के शुरुआती लक्षणों में बिना कारण एनीमिया, पीलिया, हाथ-पैरों में सूजन, बार-बार संक्रमण, अत्यधिक थकान, शारीरिक विकास में रुकावट और दर्द के दौरे शामिल हो सकते हैं। ऐसे संकेत मिलने पर तुरंत चिकित्सकीय जांच और परामर्श लेना जरूरी है, ताकि समय रहते निदान और उपचार शुरू किया जा सके।

सिकल सेल रोग किसी भी आयु वर्ग के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन शिशु और बचपन में इसकी पहचान विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है। समय पर हस्तक्षेप से दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों में उल्लेखनीय सुधार संभव है। हालांकि ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में इसके मामले 5 प्रतिशत से भी कम होते हैं, लेकिन इसकी गंभीरता को देखते हुए जागरूकता बेहद जरूरी है।

यदि इस रोग का समय पर उपचार न किया जाए, तो यह गंभीर एनीमिया, बार-बार दर्द के दौरे, संक्रमण, स्ट्रोक, अंगों को नुकसान, विकास में बाधा और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट जैसी जटिलताओं का कारण बन सकता है। वहीं, समय रहते उपचार शुरू करने से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

डॉ. वर्मा ने नवजात स्क्रीनिंग और जेनेटिक काउंसलिंग के महत्व पर विशेष जोर देते हुए कहा कि जन्म के तुरंत बाद जांच से बीमारी की पहचान संभव होती है, जिससे समय पर उपचार शुरू किया जा सकता है। वहीं, जेनेटिक काउंसलिंग परिवारों को इस रोग के वंशानुगत पैटर्न को समझने और भविष्य की योजना बनाने में मदद करती है।

उपचार की बात करें तो सिकल सेल रोग के प्रबंधन में हाइड्रॉक्सीयूरिया जैसी दवाएं, नियमित टीकाकरण, संक्रमण की रोकथाम, रक्त आधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) और सहायक चिकित्सा शामिल हैं। इसके अलावा हाल के वर्षों में लक्षित उपचार (Targeted Therapies) और स्टेम सेल प्रत्यारोपण (Stem Cell Transplantation) जैसी आधुनिक तकनीकों ने चयनित मरीजों के लिए बेहतर परिणामों की संभावनाएं बढ़ाई हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस रोग से पीड़ित मरीजों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए, अत्यधिक गर्मी या ठंड से बचना चाहिए, संक्रमण होने पर तुरंत उपचार लेना चाहिए, नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए और अत्यधिक शारीरिक श्रम से बचना चाहिए, क्योंकि ये सभी स्थितियां सिकल सेल क्राइसिस को बढ़ा सकती हैं।

सार रूप में, सिकल सेल रोग के प्रति जागरूकता, समय पर पहचान और उचित उपचार ही इस गंभीर बीमारी से होने वाली जटिलताओं को कम करने और मरीजों को बेहतर जीवन देने की कुंजी है।

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