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दर्द की दास्तान

📜 ग़ज़ल
शीर्षक: ग़म की दास्तान
मतला:
दर्द पीड़ा इतनी है कि होश नहीं,
जब भी होश में आऊंगा, ग़म की दास्तान सुनाऊंगा।
ये जो चेहरे पे हँसी का नक़ाब रखा है,
एक दिन अश्कों का समंदर भी दिखाऊंगा।
दिल के वीरान मकानों में धुआं उठता है,
मैं उसी राख से फिर ख़्वाब सजाऊंगा।
जिन्होंने छोड़ दिया वक़्त के अंधेरों में मुझे,
उनको इक रोज़ मैं आईना दिखाऊंगा।
मेरी ख़ामोश निगाहों को समझना आसान नहीं,
मैं हर इक दर्द को लफ़्ज़ों में पिरो जाऊंगा।
रात गहरी है मगर टूटूंगा नहीं मैं फिर भी,
सुबह बनकर किसी आँगन में उतर आऊंगा।
मेरे हिस्से में अगर अश्क ही अश्क आए हैं,
उनको ग़ज़लें बना महफ़िल में सुनाऊंगा।
मक़्ता:
दर्द पीड़ा इतनी है कि होश नहीं,
जब भी होश में आऊंगा, ग़म की दास्तान सुनाऊंगा।
✍️रचियता:- अनुज कुमार भार्गव
📅 ग्रेटर नोएडा
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