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मनरेगा पर सियासत तेज: गौतमबुद्ध नगर में कांग्रेस का सत्याग्रह, लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे पर सड़क पर उतरे कार्यकर्ता

🔴 स्पेशल स्टोरी: मनरेगा पर सियासत तेज: गौतमबुद्ध नगर में कांग्रेस का सत्याग्रह, लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे पर सड़क पर उतरे कार्यकर्ता
 मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा (सूरजपुर)
मनरेगा के मुद्दे पर सियासत अब केवल नीति बहस तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और राजनीतिक टकराव का रूप ले चुकी है। लखनऊ में विधानसभा घेराव के दौरान कथित पुलिसिया दमन और कांग्रेस नेताओं को जबरन रोकने के विरोध में जिला एवं शहर कांग्रेस कमेटी गौतमबुद्ध नगर ने सूरजपुर कलेक्ट्रेट परिसर में गांधी प्रतिमा के समक्ष काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण सत्याग्रह (धरना) किया।
यह प्रदर्शन केवल मनरेगा के स्वरूप में बदलाव का विरोध नहीं था, बल्कि इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा” के रूप में प्रस्तुत किया गया। सैकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस आंदोलन को राजनीतिक संदेश देने वाला आयोजन बना दिया।
📌 मनरेगा: योजना से ज्यादा राजनीतिक प्रतीक
जिला कांग्रेस अध्यक्ष दीपक भाटी चोटीवाला ने अपने संबोधन में कहा कि मनरेगा करोड़ों गरीब परिवारों की जीवनरेखा है और इसके मूल स्वरूप में परिवर्तन सामाजिक न्याय पर सीधा हमला है। उनका आरोप था कि केंद्र सरकार योजना को कमजोर कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे बचाने के लिए “सड़क से सदन तक” संघर्ष करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा केवल रोजगार गारंटी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिरता का अहम स्तंभ है। ऐसे में इसके प्रावधानों में बदलाव को लेकर विपक्षी दल इसे बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में देख रहे हैं।
🚨 लोकतंत्र बनाम दमन: असली मुद्दा क्या?
धरने का मुख्य फोकस लखनऊ विधानसभा घेराव के दौरान हुई कथित कार्रवाई रहा। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि गौतमबुद्ध नगर के कई कार्यकर्ताओं को बिना विधिक आधार के नजरबंद कर लखनऊ जाने से रोका गया, जो संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का उल्लंघन है।
नोएडा महानगर कांग्रेस अध्यक्ष मुकेश यादव ने इसे “लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी” बताया और कहा कि जनांदोलन को दबाने की कोशिश तानाशाही मानसिकता को दर्शाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, विपक्ष अब सरकार को सीधे “लोकतंत्र बनाम दमन” के नैरेटिव में घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है।
🕊 गांधी प्रतिमा के सामने सत्याग्रह: प्रतीकात्मक संदेश
धरना गांधी प्रतिमा के समक्ष आयोजित किया गया और सभी कार्यकर्ताओं ने काली पट्टी बांधी। यह आयोजन स्पष्ट रूप से अहिंसक विरोध और संवैधानिक संघर्ष का प्रतीकात्मक संदेश देने के उद्देश्य से किया गया।
धरने के बाद जिला अधिकारी के माध्यम से राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें
मनरेगा के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखने
विधानसभा घेराव के दौरान हुई कार्रवाई की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच
की मांग की गई।
📍 स्थानीय राजनीति पर असर
गौतमबुद्ध नगर जैसे औद्योगिक और शहरी जिले में मनरेगा का मुद्दा भले सीधे तौर पर सीमित प्रभाव रखता हो, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और मजदूर वर्ग के बीच इसकी गूंज है। धरने में ग्रामीण क्षेत्र से आए मजदूरों की उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस इस मुद्दे को जमीनी स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी चुनावी परिदृश्य को देखते हुए विपक्षी दल सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवाल को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना सकते हैं।
आगे क्या?
धरने के अंत में कार्यकर्ताओं ने मनरेगा के मूल स्वरूप को बनाए रखने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष का संकल्प लिया।
यह साफ है कि मनरेगा का मुद्दा अब केवल रोजगार की गारंटी का प्रश्न नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष और लोकतांत्रिक विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में जाता है, इस पर प्रदेश की राजनीति की नजरें टिकी रहेंगी।