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**ज़मीन किसानों की, मुनाफा संस्थानों का?


लीज डीड की अनदेखी पर उठे सवाल, 10 साल से अधिकारों की राह देख रहे स्थानीय परिवार
      मौहम्मद इल्यास "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
ग्रेटर नोएडा का आधुनिक स्वरूप जिन किसानों की जमीन पर खड़ा हुआ, आज वही किसान अपने ही क्षेत्र में शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित होने का आरोप लगा रहे हैं। शहर के विकास के नाम पर प्राधिकरण ने निजी स्कूलों और अस्पतालों को रियायती दरों पर भूखंड आवंटित किए थे। बदले में लीज डीड में स्पष्ट सामाजिक दायित्व तय किए गए थे—स्थानीय किसानों और गरीब परिवारों को शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में विशेष रियायत।
लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी इन शर्तों के लागू न होने का आरोप अब गंभीर जनमुद्दा बनता जा रहा है।
रियायती प्लॉट की शर्तें: सामाजिक दायित्व या सिर्फ कागज़ी औपचारिकता?
करप्शन फ्री इंडिया संगठन के संस्थापक चौधरी प्रवीण भारतीय के अनुसार, प्राधिकरण द्वारा जिन निजी संस्थानों को सस्ते दामों पर प्लॉट दिए गए, उनकी लीज डीड में निम्नलिखित स्पष्ट प्रावधान थे—
🏫 शिक्षा संस्थानों के लिए:
स्थानीय किसानों के बच्चों को ट्यूशन फीस में 25% की छूट
किसी भी प्रकार का अतिरिक्त या छुपा हुआ शुल्क न लिया जाए
🏥 अस्पतालों के लिए:
स्थानीय किसानों के लिए सुबह 2 घंटे और शाम 2 घंटे मुफ्त ओपीडी, वह भी अनुभवी डॉक्टर द्वारा
भर्ती होने की स्थिति में इलाज पर 40% की छूट
10% बेड गरीब ग्रामीणों के लिए पूर्णतः निशुल्क आरक्षित
शहर में रह रहे गरीब परिवारों को इलाज में 50% तक की रियायत
संगठन का आरोप है कि इन प्रावधानों का पालन न तो स्कूलों में हो रहा है और न ही अस्पतालों में। किसानों को सामान्य दरों पर ही फीस और इलाज का भुगतान करना पड़ रहा है।
विशेष एंगल: सामाजिक न्याय बनाम व्यावसायिक मॉडल
यह मुद्दा केवल फीस या छूट तक सीमित नहीं है। यह उस सामाजिक समझौते का सवाल है, जिसके आधार पर किसानों ने अपनी जमीन शहर के विकास के लिए सौंपी थी।
विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी निजी संस्था को बाज़ार दर से कम कीमत पर भूमि दी जाती है, तो वह केवल व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व निभाने के लिए भी होती है। यदि संस्थान केवल मुनाफे के मॉडल पर काम कर रहे हैं और सामाजिक शर्तों को नज़रअंदाज कर रहे हैं, तो यह सार्वजनिक संसाधनों के उद्देश्य से विचलन माना जाएगा।
प्राधिकरण की भूमिका पर प्रश्नचिह्न
सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक निगरानी पर उठ रहा है—
क्या पिछले 10 वर्षों में लीज डीड अनुपालन की कोई समीक्षा की गई?
क्या स्कूलों और अस्पतालों से अनुपालन रिपोर्ट ली गई?
क्या किसी उल्लंघन पर नोटिस या दंडात्मक कार्रवाई हुई?
यदि नहीं, तो क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या मिलीभगत?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्राधिकरण नियमित ऑडिट और निरीक्षण करे, तो सच्चाई सामने आ सकती है।
किसानों की पीड़ा: “हमने शहर बसाया, पर सुविधाएं नहीं मिलीं”
गांवों के कई परिवारों का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते खर्च के कारण वे आर्थिक दबाव में हैं। निजी स्कूलों की ऊंची फीस और अस्पतालों के भारी बिल उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
उनका आरोप है कि यदि लीज डीड की शर्तें ईमानदारी से लागू हों, तो हजारों परिवारों को सीधी राहत मिल सकती है।
ज्ञापन और आंदोलन की चेतावनी
वरिष्ठ कार्यकर्ता धर्मेंद्र भाटी के नेतृत्व में संगठन ने ओएसडी अभिषेक पाठक को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि लीज डीड की सभी शर्तों को तत्काल प्रभाव से लागू कराया जाए।
चौधरी प्रवीण भारतीय ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो संगठन बड़े स्तर पर आंदोलन करेगा। उन्होंने कहा—
"यह केवल छूट का मुद्दा नहीं, बल्कि किसानों के सम्मान और अधिकार का प्रश्न है।"
आगे क्या?
यह मामला अब केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि प्राधिकरण सख्ती से नियम लागू करता है, तो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सामाजिक संतुलन स्थापित हो सकता है।
लेकिन यदि अनदेखी जारी रही, तो यह मुद्दा न केवल आंदोलन का रूप ले सकता है, बल्कि शहर के विकास मॉडल पर भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।
अब निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं—क्या जमीन देने वालों को उनका हक मिलेगा, या फिर रियायत की शर्तें यूं ही कागजों में दबी रहेंगी?