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लंकापति रावण के हाथ से हिमालय से लौटते वक्त मां शक्ति बागपत जिले के गांव रावण उर्फ बड़ा में आकर छूट गई

 

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शरदीय नवरात्रों के शुरू होते ही ज्योति प्रतिष्ठपित होने के साथ पूजा अर्चनाएं और मां का गुणगान शुरू

रावण मूर्ति लेकर चल दिया। जहां आज बड़ागांव है, वहां पर आते ही लंकापति ने लघुशंका जाने से पहले मूर्ति को संभालने के लिए एक चरवाहे को दे दिया था। चरवाहे ने देवी मूर्ति भूमि पर रख दी। यहीं पर प्राचीन मंशा देवी मंदिर हैंः विशेष त्यागी गांव निवासी भक्त

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मौहम्मद इल्यास-’’दनकौरी’’/ बागपत

शरदीय नवरात्रों के शुरू होते ही ज्योति प्रतिष्ठपित होने के साथ पूजा अर्चनाएं और मां का गुणगान शुरू हो गया है। इसके साथ ही भव्य रामलीलाआेंं के द्वारा मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम की जय घोष और सत्य पर असत्य के प्रतीक रावण का नाश करने के लिए दशहरा पर्व की गूंज भी सुनाई दे रही हैं। किंतु गौतमबुद्धनगर का बिसरख और बागपत जिले का रावण उर्फ बडा गांव ऐसे स्थान हैं जहां रावण का नाश नही बल्कि अशुभ भी माना जाता है। इन दोनों गांवों में रावण पुतला नही जलाया जाता हैं। बिसरख में रावण का मंदिर स्थापित किया गया है और वहीं रावण उर्फ बडा गांव में रावण का पुतला जलाया जाना निषेद्ध बना हुआ हैं। यहां सिद्ध पीठ मां मंशा देवी की स्थापना भी रावण के द्वारा की हुई मानी जाती हैं। नवरात्रों के शुरू होते ही आज सिद्ध पीठ मां मंशा देवी मंदिर में भी पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना की गई। रावण उर्फ बडा गांव निवासी विशेष त्यागी ने ’’विजन लाइव’’ को बताया कि आज नवरात्रों के शुरू होते ही सिद्ध पीठ मां मंशा देवी मंदिर में भी पूरे विधि विधान से पूजा अर्चना की गई। हिमालय से लौटते वक्त लंकापति रावण के हाथ से मां शक्ति बागपत जिले के गांव रावण उर्फ बड़ा में आकर छूट गई थी। ऐसी यहां के लोगों की मान्यता है।

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इतिहासकार भी मान रहे हैं कि बड़ा गांव से महाभारत और रामायण काल का गहरा नाता रहा है। जिस स्थान पर रावण के हाथ से शक्ति छूटी थी, वहां आज एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। इस मंदिर का नाम मां मंशा देवी मंदिर रखा गया है। कहते हैं कि यह मां की शक्ति सिद्ध पीठ हैं। सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से मांगी गई मनोकामना मां जरूर पूरी करती हैं। उन्होनें बताया कि गौतमबुद्धनगर में स्थित गांव बिसरक को रावण की जन्मस्थली माना जाता है। आज भी बिसरक गांव में रावण का दहन नहीं किया जाता। पुरातत्व की दृष्टि से देखें तो यहां पुराने अवशेष मिलते हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि रावण का इस गांव से कुछ कुछ नाता जरूर था। रावण की ससुराल मेरठ को ही बताया जाता है। उस समय मेरठ का नाम मयराष्ट्र था। सूरज कुंड स्थल वह स्थान है जहां रावण की पत्नी मंदोदरी स्नान के लिए जाया करती थीं। वहीं, बिल्वेश्वर नाथ महादेव मंदिर में मंदोदरी पूजा के लिए जाती थीं। राजपाल त्यागी ने बताया कि गांव में प्राचीन मंशा देवी मंदिर त्रेता युग का गवाह है। मंसा देवी मंदिर के बारे में लोगों की मानना है कि रावण ने घोर तपस्या कर मां मंशा देवी को प्रसन्न किया और मां से लंका में स्थापित होने का वरदान मांगा। देवी ने शर्त रखी थी कि वह साथ चलेंगी, लेकिन जहां मूर्ति को रख देंगे वहीं स्थापित हो जाएंगी। रावण मूर्ति लेकर चल दिया। 

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जहां आज बड़ागांव है, वहां पर आते ही लंकापति ने लघुशंका जाने से पहले मूर्ति को संभालने के लिए एक चरवाहे को दे दिया था। चरवाहे ने देवी मूर्ति भूमि पर रख दी। यहीं पर प्राचीन मंशा देवी मंदिर हैं। प्रधान दिनेश त्यागी ने बताया कि एक तरफ देशभर में दशहरा धूमधाम से मनाया जाएगा, लेकिन जनपद के बड़ा गांव में लंकापति की मान्यता है। बड़ागांव उर्फ रावण में प्राचीन मंशा देवी का मंदिर है। लंकापति के कारण ही उनके गांव में देवी मंदिर की स्थापना हो सकी है, इसी वजह से गांव का नाम भी लंकापति के नाम पर पड़ गया।