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कानून रिव्यूः ...........पुनरीक्षणकर्ता को पुनः सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए विधिसम्मत आदेश पारित करें

उत्तर प्रदेश की बागपत जिला अदालत ने पुनरीक्षणकर्ता/वादी की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकारते हुए निचली अदालत को यह आदेश दिए

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मौहम्मद इल्यास-’’दनकौरी’’/गौतमबुद्धनगर

5-5 लाख रूपये के चार चैक फर्जी रूप से लिखे गये या नहीं या उसके संबंध में कोई साक्ष्य है, या नहीं। केवल देरी के आधार पर अंतिम आख्या को स्वीकार करना न्यायोचित नहीं था, अपितु यह देखना चाहिए था कि प्रथम दृष्टया बाद बनता है, या नहीं। केवल सिविल न्यायालय में सिविल कार्यवाही लंबित रहने के आधार पर फौजदारी कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता है। पुनरीक्षणकर्ता/वादी को यह अधिकार है कि वह सिविल कार्यवाही के साथ साथ धोखाधडी के संबंध में फौजदारी की कार्यवाही कर सकता है। पुनरीक्षणकर्ता/वादी के द्वारा यह कथन किया गया है कि उसके साथ धोखाधडी की गयी है तथा पुनरीक्षण न्ययालय ने इस आधार पर कि पिता ने कोई शिकायत नहीं की, अपना निष्कर्ष दिया है, तब विद्वान अवर न्यायालय को पुनरीक्षण न्यायालय के निष्कर्ष के आधार पर नहीं, बल्कि अपना निष्कर्ष देना चाहिए था कि वास्तव में कोई प्रथम दृष्टया अपराध बन रहा है, या नहीं बन रहा है। उत्तर प्रदेश की बागपत जिला अदालत ने पुनरीक्षणकर्ता/वादी की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकारते हुए निचली अदालत को यह आदेश दिए हैं।

पुनरीक्षणकर्ता के विद्वान अधिवक्ता का तर्क रहा कि विवेचक अभियुक्तगण से मिला हुआ था, उसने अपने स्थानान्तरण होने के बाद भी अंतिम आख्या प्रेषित कर दी। उनके द्वारा लिखित बहस के साथ जॉच रिपोर्ट दाखिल की गयी है, जिसमें विवेचक की लापरवाही के लिए दोषी पाया गया है, जिसके द्वारा स्थानान्तरण के बाद भी अंतिम आख्या प्रेषित की गयी है। इस प्रकार विद्वान अवर न्यायालय ने सही प्रकार से साक्ष्य का विवेचन किये बिना ही आलोच्य आदेश पारित कर दिया है। जब कि केस डायरी पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर यह देखना चाहिए था कि पुनरीक्षणकर्ता से धोखाधडी होने का या अन्य कोई अपराध बनता है, या नहीं। इस प्रकार आलोच्य आदेश क्षेत्राधिकार के तहत पारित नहीं किया गया है। अतःएव पुनरीक्षण स्वीकार किये जाने योग्य है तथा आलोच्य आदेश अपास्त किये जाने योग्य है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश बागपत सुधीर कुमार ने इस मामले में आदेश दिया है कि प्रस्तुत अपराधिक पुनरीक्षण स्वीकार किया जाता है तथा विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आलोच्य आदेश दिनांक 11-10-2021 अपास्त किया जाता है। अवर न्यायालय को निर्देशित किया जाता है कि वह निर्णय में दिये गये निष्कर्ष के आलोक में पुनरीक्षणकर्ता को पुनः सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए विधिसम्मत आदेश पारित करें।

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न्यायालय सत्र न्यायाधीश, बागपत सुधीर कुमार के यहां पुनरीक्षणकर्ता हरिनिवास त्यागी पुत्र रामचन्द्र त्यागी, निवासी ग्राम रावण उर्फ बडागांव, थाना खेकडा, जिला बागपत, हाल निवासी 471 प्रीत विहार, कस्बा मुरादनगर, थाना मुरादनगर, जिला गाजियाबाद की ओर से पुनरीक्षणकर्ता बनाम 1- दुष्यन्त उर्फ मन्नू त्यागी पुत्र मंगत त्यागीए निवासी ग्राम सुल्तानपुर सैक्टर 128 नोएडा जिला गौतमबुद्धनगर, 2- ललित पुत्र रामकिशोर, निवासी ग्राम सुल्तानपुर सैक्टर 128 नोएडा जिला गौतमबुद्धनगर, 3- ब्रजेश पुत्र श्रीनिवास, निवासी ग्राम सुल्तानपुर सैक्टर 128 नोएडा जिला गौतमबुद्धनगर, 4- राकेश पुत्र छज्जू निवासी शाहपुर थाना एक्सप्रेस.वे सैक्टर 128 नोएडा, जिला गौतमबुद्धनगर, 5 सुरेश पुत्र राजेन्द्रए निवासी ग्राम बरौला, नोएडा, जिला गौतमबुद्धनगर, 6- उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा जिला मजिस्ट्रेट, बागपत,........ प्रत्यर्थीगण एक पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत हुई।

 यह अपराधिक पुनरीक्षण, पुनरीक्षणकर्ता की ओर से फौजदारी विविध वाद संख्या 365/2021 हरिनिवास त्यागी बनाम दुष्यन्त उर्फ मन्नू त्यागी आदि, अन्तर्गत धारा 420, 467, 468, 471, 328, 323, 506 भा..सं. थाना खेकडा, जनपद बागपत में विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बागपत द्वारा पारित आदेश दिनांक 11-10-2021 के विरूद्ध प्रस्तुत किया गया है, जिसके द्वारा पुनरीक्षणकर्ता/वादी की ओर से प्रस्तुत विरोध याचिका को निरस्त करते हुए अंतिम आख्या को स्वीकार कर लिया गया था। पुनरीक्षण निम्न आधारों पर प्रस्तुत की गई कि आलोच्य आदेश साक्ष्य के विपरीत पारित किया गया है। पुनरीक्षणकर्ता के पुत्र की चिकित्सीय परीक्षण रिपोर्ट केस डायरी में संलग्न थी, जिसमें उसे जहर देकर मारने का प्रयास किया गया था, इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया। जमीन की कीमत बीस लाख रूपये प्रतिबीघा से कम नहीं है, जबकि 16 लाख रूपये प्रतिबीघा की दर से जमीन तय कर ली और पाँच.पाँच लाख रूपये के चार चैक ले लिये, जिसकी साक्ष्य पत्रावली पर उपलब्ध थी, जिस ओर भी कोई ध्यान विद्वान अवर न्यायालय द्वारा नहीं दिया गया है। धोखाधडी करके बिना प्रतिफल दिये बैनामा करा लिया है तथा कम्प्यूटर पर फोटो खींचकर वसीयत की काफी बैनामा निरस्तीकरण के बाद में दाखिल की गयी है, जो आपस में साज करके किया गया है। जब कि विपक्षी संख्या 2 तथ 5 से पाँच.पाँच लाख रूपये रुपये उधार लेना कहा था, जिसके सम्बन्ध में चैक संख्या 808225, 808222, 808224 808221 के द्वारा अदा करना बताया है, परन्तु नोटरी अधिवक्ता श्री रविन्द्र दत्त शर्मा द्वारा फर्जी नोटरी करायी गयी है, जिस पर रविन्द्र दत्त शर्मा ने प्रमाण.पत्र दिया है कि उसके हस्ताक्षर उक्त शपथ.पत्र पर नहीं हैं। पुनरीक्षणकर्ता उसके पुत्र आदेश त्यागी के फर्जी शपथ.पत्र बनाकर उनके हस्ताक्षर बनाये गये हैं।

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पुनरीक्षणकर्ता के  पुत्र विशेष त्यागी 

दिनांक 14-04-2018 को समय करीब 12.00 बजे दिन पुनरीक्षणकर्ता का पुत्र विशेष त्यागी अपने घर आया था, जब वह खेत पर था तो उसके अपहरण का प्रयास किया गया और जान से मारने की धमकी दी और गाड़ी में खींचने का प्रयास किया गया। वह कोरे कागज पर हस्ताक्षर कराना चाहते थे। विवेचक के द्वारा पुनरीक्षणकर्ता के पुत्र को जहर देकर मारने के सम्बन्ध में कोई विवेचना नहीं की गयी है, जो धारा 161 .प्र.सं. के बयान लिखे गये हैं, वह मनमाने रूप से लिखे गये हैं। जो शपथ पत्र पुनरीक्षणकर्ता ने भेजे थे, उनको विवेचना में शामिल नहीं किया गया। विवेचक का स्थानान्तरण दिनांक 16-11-2020 को हो गया था, परन्तु उसके द्वारा दिनांक 17-11-2020 को स्थानान्तरण होने रिलीव होने के बाद भी अंतिम आख्या दी है, जिससे सिद्ध होता है कि अभियुक्तगण से मिलकर अंतिम आख्या प्रेषित की गयी है। पुनरीक्षणकर्ता/वादी के द्वारा यचिका में यह भी कहा गया कि प्रार्थना.पत्र अन्तर्गत धारा 156 (3)- .प्र.सं. के तहत इन कथनों के साथ रिपोर्ट दर्ज कराने हेतु प्रस्तुत किया गया कि वह 83 वर्षीय बुजुर्ग व्यक्ति है। उसका पुत्र विशेष त्यागी ने वर्ष 2012 में दुष्यन्त त्यागी के साथ नोएडा में पी. जी. संचालित की थी, जिसमें घाटा दिखाकर 16 लाख रूपये की देनदारी दिखा दी, जिस पर 5 से 10 प्रतिशत मासिक ब्याज वसूलने का दबाब बनाना शुरू कर दिया। वर्ष 2014.-16 के बीच जबरदस्ती साठ लाख रूपये वसूल लिये तथा शेष धनराशि वसूलने के लिए धमकी देता रहा, मना करने पर दिनांक 12-05-2016 को उसके पुत्र को जान से मारने की नीयत से जहर पिला दिया, वह अस्पताल में भर्ती रहा। दिनांक 29-05-2016 को उसके पुत्र का अपहरण कर लिया। उसके बाद पाँच बीघा जमीन, जिसकी कीमत बीस लाख रूपये प्रति बीघा से कम नहीं है, उसे 16 लाख रूपये प्रतिबीधा की दर से 80 लाख रूपये में बेचना तय किया, जिसके सम्बन्ध में चैक दिये। वह चैक भी वापस ले लिये गये कि आयकर बचाना है और पाँच बीघा का बैनामा करा लिया, जो धोखे से कराया गया है। बीस लाख रूपये के चैक ललित, ब्रिजेश, राकेश सुरेश के नाम भरकर जमा करा लिये तथा बीस लाख रूपये भी पुनरीक्षणकर्ता के ले लिये। इस प्रकार से विशेष त्यागी उक्त सभी कारणों से डिप्रेशन में रहने लगा। विपक्षी दुष्यन्त त्यागी ने फर्जीवाडा करके उसके पुत्र के हक में की गयी वसीयत के सम्बन्ध में रजिस्ट्रार कार्यालय खेकड़ा से निकलवाकर उसके पुत्र के द्वारा किये गये बैनामा निरस्तीकरण के मुकदमें में दाखिल कर दिया। जो हस्ताक्षर हैं, वह फर्जी बनाये गये हैं। इसलिए मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाये। इस क्रम में तत्कालीन अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट/ सिविल जज, सी.डि. बागपत ने अपने आदेश दिनांक 07-07-2020 से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश पारित किये गये, जिसके आधार पर मु..ा् सं. 258/2020 दर्ज किया गया तथा केस की विवेचना उपनिरीक्षक विजयदत्त शर्मा के द्वारा की गयी, जिन्होने विवेचना में अपराध होना पाते हुए अंतिम आख्या प्रेषित की। अंतिम आख्या पर पुनरीक्षणकर्ता/वादी के द्वारा विरोध याचिका प्रस्तुत की गयी, जिसमें उसके द्वारा कथन किया गया कि विवेचक के द्वारा गलत रूप से विवेचना कर अंतिम आख्या प्रेषित की गयी है। धारा 161 .प्र.सं. के बयान में वादी उसके पुत्र ने धोखाधड़ी करने जहर पिलाने के प्रयास का बयान दिया था, परन्तु विवेचक ने तोड़.मरोड़ कर बयान लिखे हैं। अपहरण करने के सम्बन्ध में भी बयान दिये गये थे। पुलिस अधीक्षक, बागपत को शपथ.पत्र भेजे गये थे, परन्तु विवेचक ने उपरोक्त शपथ.पत्रों को विवेचना में शामिल नहीं किया तथा फर्जी रूप से पुनरीक्षणकर्ता/ वादी के पुत्र आदेश का शपथ पत्र लिया गया है जो चार चैक पाँच.पाँच लाख रूपये के आयकर बचाने हेतु बहाना करके लिये गये थे, उसके सम्बन्ध में भी कोई विवेचना नहीं की गयी है। जो शपथ.पत्र दाखिल किये गये हैं, वह फर्जी हैं। वह वरिष्ठ नागरिक है। अभियुक्तगण से साज करके अंतिम आख्या प्रेषित की गयी है। यह भी कथन किया गया है कि विवेचक ने दिनांक को अंतिम आख्या प्रेषित कर दी, जबकि उसका स्थानान्तरण दिनांक 16-11-2020 को हो चुका था। अतः अभियुक्तगण को विचारण हेतु तलब किया जाना चाहिए था।

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पुनरीक्षणकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने अपनी लिखित बहस मौखिक रूप से कथन किया है कि विबेचक अभियुक्तगण से मिला हुआ है, क्योंकि विवेचक का स्थानान्तरण दिनांक 16-11-2020 को हो गया था तथा उसके द्वारा दिनांक 17-11-2020 को अंतिम आख्या प्रेषित की गयी है, जिसके सम्बन्ध में वादी ने शिकायत की थी तथा क्षेत्राधिकारी बडौत के द्वारा शिकायत को सही पाया गया कि विवेचक ने अंतिम आख्या स्थानान्तरण के बाद प्रेषित की है। यह भी तर्क दिया गया है कि केस डायरी पर जो साक्ष्य उपलब्ध थी, उसकी ओर अवर न्यायालय ने ध्यान नहीं दिया। यह भी तर्क दिया गया है कि यदि अग्रिम विवेचना की आवश्यकता थी तो विद्वान अवर न्यायालय को अग्रिम विवेचना करानी चाहिए थी। जो साक्ष्य केसडायरी पर उपलब्ध थी, उससे धोखाधड़ी किया जाना सिद्ध होता है, अतः आलोच्य आदेश अपास्त किया जाये। वहीं दूसरी ओर  विपक्षीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा तर्क दिया गया है कि पुनरीक्षणकर्ता/वादी के पुत्र विशेष त्यागी के द्वारा परिवाद दाखिल किया गया था, जो धारा 203 .प्र.सं.ा् के तहत निरस्त किया गया तथा उसके विरूद्ध दाखिल अपराधिक पुनरीक्षण भी निरस्त हुआ। विवेचक ने अंतिम आख्या सही प्रेषित की है। यह भी तर्क दिया गया है कि कैसडायरी में ऐसी कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे सिद्ध हो सके कि अभियुक्तगण ने धोखाधडी की है। आलोच्य आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। विद्वान अवर न्यायालय ने अपने में निहित क्षेत्राधिकार के तहत ही आलोच्य आदेश पारित किया है, आलोच्य आदेश में कोई त्रुटि नहीं है। विद्वान अवर न्यायालय ने अपने में निहित क्षेत्राधिकार के तहत ही आलोच्य आदेश पारित किया है, जिसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। अपराधिक पुनरीक्षण बलहीन है, निरस्त किया जाये। अंतिम आख्या प्राप्त होने के बाद विद्वान मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्राप्त है। कि वह अंतिम आख्या का स्वीकार कर सकता है, केसडायरी में साक्ष्य उपलब्ध होने के आधार पर अभियुक्तगण को तलब कर सकता है या परिवाद के रूप में दर्ज करके स्वयं जॉच कर सकता है। यदि आवश्यकता हो तो अग्रिम विवेचना के आदेश पारित कर सकता है।
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न्यायालय सत्र न्यायाधीश, बागपत सुधीर कुमार ने पुनरीक्षण याचिका में संबंधित पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद आदेश दिया है कि प्रस्तुत अपराधिक पुनरीक्षण स्वीकार किया जाता है तथा विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आलोच्य आदेश दिनांक 11-10-2021 अपास्त किया जाता है। अवर न्यायालय को निर्देशित किया जाता है कि वह निर्णय में दिये गये निष्कर्ष के आलोक में पुनरीक्षणकर्ता को पुनः सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए विधिसम्मत आदेश पारित करें।