0 महेंद्र कुमार आर्य

अथ राजधर्मान् व्याख्यास्यामः

राजधर्मान् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः।

सम्भवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा।।१।।

ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि।

सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम्।।२।। मनु०।।

अब मनु जी महाराज ऋषियों से कहते हैं कि चारों वर्ण और चारों आश्रमों के व्यवहार कथन के पश्चात् राजधर्मों को कहेंगे कि जिस प्रकार का राजा होना चाहिये और जैसे इस के होने का सम्भव तथा जैसे इस को परमसिद्धि प्राप्त होवे उस को सब प्रकार कहते हैं।।१।। कि जैसा परम विद्वान् ब्राह्मण होता है वैसा विद्वान् सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा यथावत् करे।।२।। उस का प्रकार यह है.

त्रीणि राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भूषाथः सदांसि ।।

दृ ऋ० मं० ३। सू० ३८। मं० ६।।

ईश्वर उपदेश करता है कि ;राजानाद्ध राजा और प्रजा के पुरुष मिल के ;विदथेद्ध सुखप्राप्ति और विज्ञानवृद्धिकारक राजा प्रजा के सम्बन्धरूप व्यवहार में ;त्रीणि सदांसिद्ध तीन सभा अर्थात् विद्यार्य्यसभाए धर्मार्य्यसभा, राजार्य्यसभा नियत करके ;पुरूणिद्ध बहुत प्रकार के ;विश्वानिद्ध समग्र प्रजासम्बन्धी मनुष्यादि प्राणियों को ;परिभूषथः सब ओर से विद्याए स्वातन्त्र्यए धर्मए सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।

तं सभा च समितिश्च सेना च ।।१।।

.अथर्व० कां० १५। अनु० २। व० ९। मं० २।।

सभ्य सभां मे पाहि ये च सभ्याः सभासदः ।।२।।

.अथर्व० कां० १९। अनु० ७। व० ५५। मं० ६।।

;तम्द्ध उस राजधर्म को ;सभा चद्ध तीनों सभा ;समितिश्चद् संग्रामादि की व्यवस्था और ;सेना चद्ध सेना मिलकर पालन करें।।१।।

सभासद् और राजा को योग्य है कि राजा सब सभासदों को आज्ञा देवे कि हे ;सभ्यद्ध सभा के योग्य मुख्य सभासद् तू ;मेद्ध मेरी ;सभाम्द्ध सभा की धर्मयुक्त व्यवस्था का ;पाहिद्ध पालन कर और ;ये च द्ध जो ;सभ्याःद्ध सभा के योग्य ;सभासदःद्ध सभासद हैं वे भी सभा की व्यवस्था का पालन किया करें।।२।।

इस का अभिप्राय यह है कि एक को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति तदधीन सभाए सभाधीन राजाए राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन रहै। यदि ऐसा न करोगे तो.

राष्ट्रमेव विश्या हन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुकः।। विशमेव राष्ट्रायाद्यां

करोति तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्टं पशुं मन्यत इति।।१।।

.शत० कां० १३। अनु० २। ब्रा० ३।।

जो प्रजा से स्वतन्त्र स्वाधीन राजवर्ग रहै तो ;राष्ट्रमेव विश्या हन्तिद्ध राज्य में प्रवेश करके प्रजा का नाश किया करे। जिसलिये अकेला राजा स्वाधीन वा उन्मत्त होके ;राष्ट्री विशं घातुकःद्ध प्रजा का नाशक होता है अर्थात् ;विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोतिद्ध वह राजा प्रजा को खाये जाता ;अत्यन्त पीड़ित करताद्ध है इसलिये किसी एक को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिये। जैसे सिह वा मांसाहारी हृष्ट पुष्ट पशु को मार कर खा लेते हैंए वैसे ;राष्ट्री विशमत्तिद्ध स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता है अर्थात् किसी को अपने से अधिक न होने देताए श्रीमान् को लूट खूंट अन्याय से दण्ड लेके अपना प्रयोजन पूरा करेगा। इसलिये.

इन्द्रो जयाति न परा जयाता अधिराजो राजसु राजयातै ।

चर्कृत्य ईड्यो वन्द्यश्चोपसद्यो नमस्यो भवेह ।।

.अथर्व० कां० ६। अनु० १०। व० ९८। म० १।।

हे मनुष्यो ! जो ;इह इस मनुष्य के समुदाय में ;इन्द्रःद् परम ऐश्वर्य का कर्त्ता शत्रुओं को ;जयातिद्ध जीत सके ;न पराजयातैद्ध जो शत्रुओं से पराजित न हो ;राजसुद्ध राजाओं में ;अधिराजःद सर्वोपरि विराजमान ;राजयातै प्रकाशमान हो ;चर्कृत्यःद्ध सभापति होने को अत्यन्त योग्य ;ईड्यः प्रशंसनीय गुण, कर्म, स्वभावयुक्त ;वन्द्यः सत्करणीय ;चोपसद्यः समीप जाने और शरण लेने योग्य ;नमस्यः सब का माननीय ;भवद्ध होवे उसी को सभापति राजा करें।

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ।

यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।।१।।


दृ ऋ० मं० १। सू० १६४। मं० ३९।।

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ईशा वास्य मिदँ् सर्वं यत्किञ्च जगत्याञ्जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।२।।

.यजु० अ० ४०। मं० १।।

अ हम्भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वतः ।

मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे विभजामि भोजनम् ।।३।।

दृ ऋ० मं० १०। सू० ४८। मं० १।।

अ हमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽवतस्थे कदाचन ।

सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन ।।४।।

दृ ऋ० मं० १०। सू० ४८। मं० ५।।

अ हं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।

अ हं भुवं यजमानस्य चोदिताऽयज्वनः साक्षि विश्वस्मिन्भरे ।।५।।

दृ ऋ० मं० १०। सू० ४९। मं० १।।

;ऋचो अक्षरेद्ध इस मन्त्र का अर्थ ब्रह्मचर्य्याश्रम की शिक्षा में लिख चुके हैं अर्थात् जो सब दिव्य गुणए कर्मए स्वभावए विद्यायुक्त और जिस में पृथिवी सूर्य्यादि लिक स्थित हैं और जो आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है उस को जो मनुष्य न जानते न मानते और उस का ध्यान नहीं करते वे नास्तिक मन्दमति सदा दुःखसागर में डूबे ही रहते हैं। इसलिये सर्वदा उसी को जानकर सब मनुष्य सुखी होते हैं।

प्रश्न- वेद में ईश्वर अनेक हैं इस बात को तुम मानते हो वा नहीं

उत्तर- नहीं मानते क्योंकि चारों वेदों में ऐसा कहीं नहीं लिखा जिस से अनेक ईश्वर सिद्ध हों। किन्तु यह तो लिखा है कि ईश्वर एक है।

प्रश्न- वेदों में जो अनेक देवता लिखे हैं उस का क्या अभिप्राय है

उत्तर- देवता दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण कहाते हैं जैसी कि पिथिवीए परन्तु इस को कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना है। देखो ! इसी मन्त्र में कि ष्जिस में सब देवता स्थित हैंए वह जानने और उपासना करने योग्य ईश्वर है।ष् यह उनकी भूल है जो देवता शब्द से ईश्वर का ग्रहण करते हैं। परमेश्वर देवों का देव होने से महादेव इसीलिये कहाता है कि वही सब जगत् की उत्पत्तिए स्थितिए प्रलयकर्त्ताए न्यायाधीशए अधिष्ठाता है।

जो यसिंत्रशतिंत्रशता० इत्यादि वेदों में प्रमाण हैं इस की व्याख्या शतपथ में की है कि तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब रोदन कराने वाले होते हैं। संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिये हैं कि ये सब की आयु को लेते जाते हैं।

बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि परम ऐश्वर्य का हेतु है। यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिस से वायु वृष्टि जल ओषधी की शुद्धिए विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्पविद्या से प्रजा का पालन होता है। ये तेंतीस पूर्वोक्त गुणों के योग से देव कहाते हैं। इन का स्वामी और सब से बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां उपास्यदेव शतपथ के चौदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है। इसी प्रकार अन्यत्र भी लिखा है। जो ये इन शास्त्रें को देखते तो वेदों में अनेक ईश्वर माननेरूप भ्रमजाल में गिरकर क्यों बहकतेघ् ।।१।।

हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग।।२।।

ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत् का पति हूं। मैं सनातन जगत्कारण और सब धनों का विजय करनेवाला और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं वैसे पुकारें। मैं सब को सुख देनेहारे जगत् के लिये नाना प्रकार के भोजनों का विभाग पालन के लिये करता हूं।।३।।

मैं परमैश्वर्य्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो। हे जीवो ! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ।।४।।

हे मनुष्यो! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझ को वह वेद यथावत् कहता उस से सब के ज्ञान को मैं बढ़ाताय मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ करनेहारे को फलप्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है उस सब कार्य्य का बनाने और धारण करनेवाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ किसी दूसरे को मेरे स्थान में मत पूजोए मत मानो और मत जानो।।५।।

अथ सृष्ट्युत्पत्तिस्थितिप्रलयविषयान् व्याख्यास्यामः

इयं विसृष्टिर्यत आ बभूव यदि वा दधे यदि वा न ।

यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद ।।१।।

दृऋ० मं० १०। सू० १२९। मं० ७।।

तम आसीत्तमसा गूळमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।

तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम् ।।२।।

दृऋ० मं०। सू०। मं०।।

हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे भतूस्य जातः पतिरेक आसीत् ।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधमे ।।३।।

.ऋ०मं० १०। सू० १२९। मं० १।।

पुरुष एवेदँ् सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्म्िर ।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।४।।

.यजुः अ० ३१। मं० २।।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति।

यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म।।५।।

.तैनिरीयोपनि०।

हे  मनुष्य! जिस से यह विविध सृष्टि प्रकाशित हुई है जो धारण और प्रलयकर्त्ता है जो इस जगत् का स्वामी है जिस व्यापक में यह सब जगत् उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय को प्राप्त होता है सो परमात्मा है। उस को तू जान और दूसरे को सृष्टिकर्त्ता मत मान।।१।।

यह सब जगत् सृष्टि से पहले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाशरूप सब जगत् तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी आच्छादित था। पश्चात् परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से कारणरूप से कार्यरूप कर दिया।।२।।

हे मनुष्यो! जो सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का आधार और जो यह जगत् हुआ है और होगा उस का एक अद्वितीय पति परमात्मा इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था। और जिस ने पृथिवी से लेके सूर्य्यपर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है उस परमात्मा देव की प्रेम से भक्ति किया करें।।३।।

हे मनुष्यो! जो सब में पूर्ण पुरुष और जो नाश रहित कारण और जीव का स्वामी जो पृथिव्यादि जड़ और जीव से अतिरिक्त हैय वही पुरुष इस सब भूत भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगत् का बनाने वाला है।।४।।

जिस परमात्मा की रचना से ये सब पृथिव्यादि भूत उत्पन्न होते हैं जिस से जीते और जिस में प्रलय को प्राप्त होते हैंय वह ब्रह्म है। उस के जानने की इच्छा करो।।५।।

जन्माद्यस्य यतः।। .शारीरक सू० अ० १। सूत्र० २।।

जिस से इस जगत् का जन्मए स्थिति और प्रलय होता हैय वही ब्रह्म जानने योग्य है।

प्रश्न- यह जगत् परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है वा अन्य से

उत्तर- निमित्त कारण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है परन्तु इसका उपादान कारण प्रकृति है।

प्रश्न- क्या प्रकृति परमेश्वर ने उत्पन्न नहीं की

उत्तर-नहीं। वह अनादि है।

प्रश्न- अनादि किसको कहते और कितने पदार्थ अनादि हैं

उत्तर- ईश्वरए जीव और जगत् का कारण ये तीन अनादि हैं।

प्रश्न- इसमें क्या प्रमाण है।

उत्तर-

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि स्वजाते ।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति।।१।।

.ऋ०मं० १। सू० १६४। मं० २०।।

शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।।२।। .यजुः० अ० ४०। मं० ८।।

द्वा जो ब्रह्म और जीव दोनों ;सुपर्णा चेतनता और पालनादि गुणों से सदृश ;सयुजा व्याप्य व्यापक भाव से संयुक्त ;सखाया परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और ;समानम्द्ध वैसा ही ;वृक्षम्द्ध अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न भिन्न हो जाता है वह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनों के गुण, कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं ;तयोरन्यः इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस वृक्षरूप संसार में पापपुण्यरूप फलों को ;स्वाद्वत्तिद्ध अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को ;अनश्नन्द्ध न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वरए ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूपय तीनों अनादि हैं।।१।।

शाश्वती० अर्थात् अनादि सनातन जीवरूप प्रजा के लिये वेद द्वारा परमात्मा ने सब विद्याओं का बोध किया है।।२।।

 अथ विद्याऽविद्याबन्धमोक्षविषयान् व्याख्यास्यामः

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँ्सह ।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ।।

.यजुः० अ० ४०। मं० १४।।

जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर के विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। अविद्या का लक्षण.

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या।।

यह योगसूत्र का वचन है।

जो अनित्य संसार और देहादि में नित्य अर्थात् जो कार्य जगत् देखा सुना जाता है सदा रहेगा सदा से है और योगबल से यही देवों का शरीर सदा रहता है वैसी विपरीत बुद्धि होना अविद्या का प्रथम भाग है। अशुचि अर्थात् मलमय स्त्र्यादि के शरीर और मिथ्याभाषण चोरी आदि अपवित्र में पवित्र बुद्धि। दूसरा अत्यन्त विषयसेवनरूप दुःख में सुखबुद्धि आदिए तीसरा.अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या का चौथा भाग है। यह चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहाती है। इस के विपरीत अर्थात् अनित्य में अनित्य और नित्य में नित्यए अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्रए दुःख में दुःख, सुख में सुख, अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है। अर्थात् ष्वेत्ति यथावत्तत्त्वं पदार्थस्वरूपं यया सा विद्या। यया तत्त्वस्वरूपं न जानाति भ्रमादन्यस्मिन्नन्यन्निदृ श्चिनोति साऽविद्या । जिस से पदार्थों का यथार्थ स्वरूप बोध होवे वह विद्या और जिस से तत्त्वस्वरूप न जान पड़े अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहाती है। अर्थात् कर्म और उपासना अविद्या इसलिये है कि यह बाह्य और अन्तर क्रियाविशेष नाम हैय ज्ञानविशेष नहीं। इसी से मन्त्र में कहा है कि विना शुद्ध कर्म और परमेश्वर की उपासना के मृत्यु दुःख से पार कोई नहीं होता। अर्थात् पवित्र कर्मए पवित्रेपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति और अपवित्र मिथ्याभाषणादि कर्म पाषाणमूत्र्त्यादि की उपासना और मिथ्याज्ञान से बन्ध होता है। कोई भी मनुष्य क्षणमात्र भी कर्मए उपासना और ज्ञान से रहित नहीं होता। इसलिये धर्मयुक्त सत्यभाषणादि कर्म करना और मिथ्याभाषणादि अधर्म को छोड़ देना ही मुक्ति का साधन है।

प्रश्न- मुक्ति किस को प्राप्त नहीं होती

उत्तर- जो बद्ध है!

प्रश्न- बद्ध कौन है

उत्तर- जो अधर्म अज्ञान में फंसा हुआ जीव है।

प्रश्न- बन्ध और मोक्ष स्वभाव से होता है वा निमित्त से

उत्तर- निमित्त से। क्योंकि जो स्वभाव से होता तो बन्ध और मुक्ति की निवृत्ति कभी नहीं होती।

प्रश्न- न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः।

न मुमुक्षुर्न वै मुक्तिरित्येषा परमार्थता ।।

यह श्लोक माण्डूक्योपनिषत् पर है।

जीव ब्रह्म होने से वस्तुतः जीव का निरोध अर्थात् न कभी आवरण में आयाए न जन्म लेताए न बन्ध है और न साधक अर्थात् न कुछ साधना करनेहारा है। न छूटने की इच्छा करता और न इस की कभी मुक्ति है क्योंकि जब परमार्थ से बन्ध ही नहीं हुआ तो मुक्ति क्या

उत्तर- यह नवीन वेदान्तियों का कहना सत्य नहीं। क्योंकि जीव का स्वरूप अल्प होने से आवरण में आताए शरीर के साथ प्रकट होने रूप जन्म लेताए पापरूप कर्मों के फल भोगरूप बन्धन में फंसताए उस के छुड़ाने का साधन करता दुःख से छूटने की इच्छा करता और दुःखों से छूट कर परमानन्द परमेश्वर को प्राप्त होकर मुक्ति को भी भोगता है।

प्रश्न- ये सब धर्म देह और अन्तःकरण के हैं। जीव के नहीं। क्योंकि जीव तो पाप पुण्य से रहित साक्षीमात्र है। शीतोष्णादि शरीरादि के धर्म्म हैंय आत्मा निर्लेप है।

उत्तर- देह और अन्तःकरण जड़ हैं उन को शीतोष्ण प्राप्ति और भोग नहीं है। जैसे पत्थर को शीत और उष्ण का भान वा भोग नहीं है। जो चेतन मनुष्यादि प्राणी उसका स्पर्श करता है उसी को शीत उष्ण का भान और भोग होता है। वैसे प्राण भी जड़ हैं। न उन को भूख न पिपासा किन्तु प्राण वाले जीव को क्षुधाए तृषा लगती है। वैसे ही मन भी जड़ है। न उस को हर्ष न शोक हो सकता है किन्तु मन से हर्ष, शोक, दुःख, सुख का भोग जीव करता है। जैसे बहिष्करण श्रोत्रदि इन्द्रियों से अच्छे बुरे शब्दादि विषयों का ग्रहण करके जीव सुखी दुःखी होता है वैसे ही अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से संकल्प, विकल्प, निश्चय, स्मरण और अभिमान का करने वाला दण्ड और मान्य का भागी होता है। जैसे तलवार से मारने वाला दण्डनीय होता है तलवार नहीं होती वैसे ही देहेन्द्रिय अन्तःकरण और प्राणरूप साधनों से अच्छे बुरे कर्मों का कर्त्ता जीव सुख दुःख का भोक्ता है। जीव कर्मों का साक्षी नहीं, किन्तु कर्त्ता भोक्ता है। कर्मों का साक्षी तो एक अद्वितीय परमात्मा है। जो कर्म करने वाला जीव है वही कर्मों में लिप्त होता हैय वह ईश्वर साक्षी नहीं।

प्रश्न- जीव ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है। जैसे दर्प्पण के टूटने फूटने से बिम्ब की कुछ हानि नहीं होतीए इसी प्रकार अन्तःकरण में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब जीव तब तक है कि जब तक वह अन्तःकरणोपाधि है। जब अन्तःकरण नष्ट हो गया तब जीव मुक्त है।

उत्तर- यह बालकपन की बात है। क्योंकि प्रतिबिम्ब साकार का साकार में होता है। जैसे मुख और दर्पण आकार वाले हैं और पृथक् भी हैं जो पृथक् न हो तो भी प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता। ब्रह्म निराकार, सर्वव्यापक होने से उस का प्रतिबिम्ब ही नहीं हो सकता।

प्रश्न- देखो! गम्भीर स्वच्छ जल में निराकार और व्यापक आकाश का आभास पड़ता है। इसी प्रकार स्वच्छ अन्तःकरण में परमात्मा का आभास है। इसलिये इस को चिदाभास कहते हैं।

उत्तर- यह बालबुद्धि का मिथ्या प्रलाप है। क्योंकि आकाश दृश्य नहीं तो उस को आंख से कोई भी क्योंकर देख सकता है।

प्रश्न- यह जो ऊपर को नीला और धूंधलापन दीखता है वह आकाश नीला दीखता है वा नहीं

उत्तर- नहीं।

प्रश्न- तो वह क्या है

उत्तर-अलग.अलग पृथिवी, जल और अग्नि के त्रसरेणु दीखते हैं। उस में जो नीलता दीखती है वह अधिक जल जो कि वर्षता है सो वही नीलय जो धूंधलापन दीखता है वह पृथिवी से धूली उड़कर वायु में घूमती है वह दीखती और उसी का प्रतिबिम्ब जल वा दर्प्पण में दीखता है आकाश का कभी नहीं।

प्रश्न- जैसे घटाकाश, मठाकाश, मेघाकाश और महदाकाश के भेद व्यवहार में होते हैं वैसे ही ब्रह्म के ब्रह्माण्ड और अन्तःकरण उपाधि के भेद से ईश्वर और जीव नाम होता है। जब घटादि नष्ट हो जाते हैं तब महाकाश ही कहाता है।

उत्तर- यह भी बात अविद्वानों की है। क्योंकि आकाश कभी छिन्न.भिन्न नहीं होता। व्यवहार में भी ड़ा लाओ इत्यादि व्यवहार होते हैं। कोई नहीं कहता कि घड़े का आकाश लाओ। इसलिये यह बात ठीक नहीं।

प्रश्न- जैसे समुद्र के बीच में मच्छी, कीड़े और आकाश के बीच में पक्षी आदि घूमते हैं वैसे ही चिदाकाश ब्रह्म में सब अन्तःकरण घूमते हैं। वे स्वयं तो जड़ हैं परन्तु सर्वव्यापक परमात्मा की सत्ता से जैसा कि अग्नि से लोहाय वैसे चेतन हो रहे हैं। जैसे वे चलते फिरते और आकाश तथा ब्रह्म निश्चल है वैसे जीव को ब्रह्म मानने में कोई दोष नहीं आता।

उत्तर- यह भी तुम्हारा दृष्टान्त सत्य नहीं क्योंकि जो सर्वव्यापी ब्रह्म अन्तःकरणों में प्रकाशमान होकर जीव होता है तो सर्वज्ञादि गुण उस में होते हैं वा नहींघ् जो कहो कि आवरण होने से सर्वज्ञता नहीं होती तो कहो कि ब्रह्म आवृत्त और खण्डित है वा अखण्डित जो कहो कि अखण्डित है तो बीच में कोई पड़दा नहीं डाल सकता। जब पड़दा नहीं तो सर्वज्ञता क्यों नहींघ् जो कहो कि अपने स्वरूप को भूलकर अन्तःकरण के साथ चलता सा है स्वरूप से नहींघ् जब स्वयं नहीं चलता तो अन्तःकरण जितना.जितना पूर्व प्राप्त देश छोड़ता और आगे.आगे जहां.जहां सरकता जायेगा वहां.वहां का ब्रह्म भ्रान्तय अज्ञानी होता जायेगा और जितना.जितना छूटता जायेगा वहां.वहां ज्ञानी, पवित्र और मुक्त होता जायेगा। इसी प्रकार सर्वत्र सृष्टि के ब्रह्म को अन्तःकरण बिगाड़ा करेंगे और बन्ध मुक्ति भी क्षण.क्षण में हुआ करेगी। तुम्हारे कहे प्रमाणे जो वैसा होता तो किसी जीव को पूर्व देखे सुने का स्मरण न होता क्योंकि जिस ब्रह्म ने देखा वह नहीं रहा इसलिये ब्रह्म जीवए जीव ब्रह्म एक कभी नहीं होताय सदा पृथक्.पृथक् हैं।

प्रश्न- अध्यारोप का करने वाला कौन है

उत्तर- जीव।

प्रश्न- जीव किस को कहते हो

उत्तर- अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन को।

प्रश्न- अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन दूसरा है वा वही ब्रह्म

उत्तर- वही ब्रह्म है।

प्रश्न- तो क्या ब्रह्म ही ने अपने में जगत् की झूठी कल्पना कर ली

उत्तर- हो, ब्रह्म की इससे क्या हानि

प्रश्न- जो मिथ्या कल्पना करता है क्या वह झूँठा नहीं होता

उत्तर- नहीं। क्योंकि जो मनए वाणी से कल्पित वा कथित है वह सब झूंठा है।

प्रश्न- फिर मन वाणी से झूठी कल्पना करने और मिथ्या बोलने वाला ब्रह्म कल्पित और मिथ्यावादी हुआ वा नहीं

उत्तर- हो, हम को इष्टापत्ति है।

अथाऽऽचाराऽनाचारभक्ष्याऽभक्ष्यविषयान् व्याख्यास्यामः

अब जो धर्मयुक्त कामों का आचरणए सुशीलताए सत्पुरुषों का संग और सद्विद्या के ग्रहण में रुचि आदि आचार और इन से विपरीत अनाचार कहाता हैय उस को लिखते हैं.


विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः।

हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तन्निबोधत।।१।।

कामात्मता न प्रशस्ता न चैवेहास्त्यकामता।

काम्यो हि वेदाधिगमः कर्मयोगश्च वैदिकः।।२।।

संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः।

व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः।।३।।

अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह किर्हचित्।

यद्यद्धि कुरुते किञ्चित् तत्तत्कामस्य चेष्टितम्।।४।।

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।

आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।५।।

सर्वन्तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा।

श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै।।६।।

श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः।

इह कीर्त्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम्।।७।।८।।

योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्रश्रयाद् द्विजः।

स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः।।९।।

वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।

एतच्चतुर्वधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्।।१०।।

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।

धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।११।।

वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम्।

कार्य्यः शरीरसंस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च।।१२।।

केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते।

राजन्यबन्धोर्द्वाविशे वैश्यस्य द्व्यधिके ततः।।१३।। मनु० अ० २।।

मनुष्यों को सदा इस बात पर ध्यान रखना चाहिये कि जिस का सेवन रागद्वेषरहित विद्वान् लोग नित्य करेंय जिस को हृदय अर्थात् आत्मा से सत्य कर्त्तव्य जानेंए वही धर्म माननीय और करणीय है।।१।।

क्योंकि इस संसार में अत्यन्त कामात्मता और निष्कामता श्रेष्ठ नहीं है। वेदार्थज्ञान और वेदोक्त कर्म ये सब कामना ही से सिद्ध होते हैं।।२।।

जो कोई कहे कि मैं निरिच्छ और निष्काम हूं वा हो जाऊँ तो वह कभी नहीं हो सकता क्योंकि सब काम अर्थात् यज्ञए सत्यभाषणादि व्रतए यम नियमरूपी   धर्म आदि संकल्प ही से बनते हैं।।३।।

क्योंकि जो.जो हस्तए पादए नेत्रए मन आदि चलाये जाते हैं वे सब कामना ही से चलते हैं। जो इच्छा न हो तो आंख का खोलना और मीचना भी नहीं हो सकता।।४।।

इसलिये सम्पूर्ण वेदए मनुस्मृति तथा ऋषिप्रणीत शास्त्रए सत्पुरुषों का आचार और जिस.जिस कर्म में अपना आत्मा प्रसन्न रहे अर्थात् भयए शंकाए लज्जा जिस में न हों उन कर्मों का सेवन करना उचित है। देखो! जब कोई मिथ्याभाषणए चोरी आदि की इच्छा करता है तभी उस के आत्मा में भयए शंकाए लज्जा अवश्य उत्पन्न होती है इसलिये वह कर्म करने योग्य नहीं।।५।।

मनुष्य सम्पूर्ण शास्त्रए वेदए सत्पुरुषों का आचारए अपने आत्मा के अविरुद्ध अच्छे प्रकार विचार कर ज्ञाननेत्र करके श्रुति.प्रमाण से स्वात्मानुकूल धर्म में प्रवेश करे।।६।।

क्योंकि जो मनुष्य वेदोक्त धर्म और जो वेद से अविरुद्ध स्मृत्युक्त धर्म का अनुष्ठान करता है वह इस लोक में कीर्ति और मरके सर्वोत्तम सुख को प्राप्त होता है।।७।।

श्रुति वेद और स्मृति धर्मशास्त्र को कहते हैं। इन से सब कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निश्चय करना चाहिये।।८।।

जो कोई मनुष्य वेद और वेदानुकूल आप्तग्रन्थों का अपमान करे उस को श्रेष्ठ लोग जातिबाह्य कर दें। क्योंकि जो वेद की निन्दा करता है वही नास्तिक कहाता है।।९।।

इसलिये वेदए स्मृतिए सत्पुरुषों का आचार और अपने आत्मा के ज्ञान से अविरुद्ध प्रियाचरणए ये चार धर्म के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्म लक्षित होता है।।१०।।

परन्तु जो द्रव्यों के लोभ और काम अर्थात् विषयसेवा में फंसा हुआ नहीं होता उसी को धर्म का ज्ञान होता है। जो धर्म को जानने की इच्छा करें उनके लिये वेद ही परम प्रमाण है।।११।।

इसी से सब मनुष्यों को उचित है कि वेदोक्त पुण्यरूप कर्मों से ब्राह्मणए क्षत्रियए वैश्य अपने सन्तानों का निषेकादि संस्कार करें। जो इस जन्म वा परजन्म में पवित्र करने वाला है।।१२।।

ब्राह्मण के सोलहवें, क्षत्रिय के बाईसवें और वैश्य के चौबीसवें वर्ष में केशान्त कर्म और मुण्डन हो जाना चाहिये अर्थात् इस विधि के पश्चात् केवल शिखा को रख के अन्य डाढ़ी मूँछ और शिर के बाल सदा मुंडवाते रहना चाहिये अर्थात् पुनः कभी न रखना और जो शीतप्रधान देश हो तो कामचार हैय चाहै जितने केश रक्खे और जो अति उष्ण देश हो तो सब शिखा सहित छेदन करा देना चाहिये क्योंकि शिर में बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है। डाढ़ी मूँछ रखने से भोजन पान अच्छे प्रकार नहीं होता और उच्छिष्ट भी बालों में रह जाता है।।१३।।

इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु।

संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्।।१।।

इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृच्छत्यसंशयम्।

सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धि नियच्छति।।२।।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते।।३।।

वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।

न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धि गच्छन्ति किर्हचित्।।४।।

वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।

सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिण्वन् योगतस्तनुम्।।५।।

श्रुत्वा स्पृष्टवा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः।

न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः।।६।।

नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः।

जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत्।।७।।

वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी।

एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्।।८।।

अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः।

अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम्।।९।।

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः।

ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान्।।१०।।

विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः।

वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः।।११।।

न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।

यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।१२।।

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।

यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति।।१३।।

अहिसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम्।

वाक् चैव मधुरा श्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता।।१४।। मनु० अ० २।।

मनुष्य का यही मुख्य आचार है कि जो इन्द्रियां चित्त का हरण करने वाले विषयों में प्रवृत्त कराती हैं उन को रोकने में प्रयत्न करे। जैसे घोड़ों को सारथि रोक कर शुद्ध मार्ग में चलाता है इस प्रकार इन को अपने वश में करके अधर्ममार्ग से हटा के धर्ममार्ग में सदा चलाया करे।।१।।

क्योंकि इन्द्रियों को विषयासक्ति और अधर्म में चलाने से मनुष्य निश्चित दोष को प्राप्त होता है और जब इन को जीत कर धर्म में चलाता है तभी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त होता है।।२।।

यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में इन्धन और घी डालने से बढ़ता जाता है वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त कभी नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है। इसलिये मनुष्य को विषयासक्त कभी न होना चाहिये।।३।।

जो अजितेन्द्रिय पुरुष है उसको ष्विप्रदुष्टष् कहते हैं। उस के करने से न वेदज्ञानए न त्यागए न यज्ञए न नियम और न धर्माचरण सिद्धि को प्राप्त होते हैं किन्तु ये सब जितेन्द्रिय धार्मिक जन को सिद्ध होते हैं।।४।।

इसलिये पांच कर्म पांच ज्ञानेन्द्रिय और ग्यारहवें मन को अपने वश में करके युक्ताहार विहार योग से शरीर की रक्षा करता हुआ सब अर्थों को सिद्ध करे।।५।।

जितेन्द्रिय उस को कहते हैं जो स्तुति सुन के हर्ष और निन्दा सुन के शोकय   अच्छा स्पर्श करके सुख और दुष्ट स्पर्श से दुःखए सुन्दर रूप देख के प्रसन्न और दुष्ट रूप देख के अप्रसन्नए उत्तम भोजन करके आनन्दित और निकृष्ट भोजन करके दुःखितए सुगन्ध में रुचि और दुर्गन्ध में अरुचि नहीं करता है।।६।। कभी विना पूछे वा अन्याय से पूछने वाले को कि जो कपट से पूछता हो उस को उत्तर न देवे। उन के सामने बुद्धिमान् जड़ के समान रहें। हां! जो निष्कपट और जिज्ञासु हों उन को विना पूछे भी उपदेश करे।।७।।

एक धन दूसरे बन्धु कुटुम्ब कुल, तीसरी अवस्था, चौथा उत्तम कर्म और पांचवीं श्रेष्ठ विद्या ये पांच मान्य के स्थान हैं। परन्तु धन से उत्तम बन्धुए बन्धु से अधिक अवस्थाए अवस्था से श्रेष्ठ कर्म और कर्म से पवित्र विद्या वाले उत्तरोत्तर अधिक माननीय हैं।।८।।

क्योंकि चाहै सौ वर्ष का भी हो परन्तु जो विद्या विज्ञानरहित है वह बालक और जो विद्या विज्ञान का दाता है उस बालक को भी वृद्ध मानना चाहिये। क्योंकि सब शास्त्र आप्त विद्वान् अज्ञानी को बालक और ज्ञानी को पिता कहते हैं।।९।।

अधिक वर्षों के बीतनेए श्वेत बाल के होनेए अधिक धन से और बड़े कुटुम्ब के होने से वृद्ध नहीं होता। किन्तु ऋषि महात्माओं का यही निश्चय है कि जो हमारे बीच में विद्या विज्ञान में अधिक हैय वही वृद्ध पुरुष कहाता है।।१०।।

ब्राह्मण ज्ञान सेए क्षत्रिय बल सेए वैश्य धनधान्य से और शूद्र जन्म अर्थात् अधिक आयु से वृद्ध होता है।।११।।

शिर के बाल श्वेत होने से बुढ्ढा नहीं होता किन्तु जो युवा विद्या पढ़ा हुआ है उसी को विद्वान् लोग बड़ा जानते हैं।।१२।।

और जो विद्या नहीं पढ़ा है वह जैसा काष्ठ का हाथीय चमड़े का मृग होता है वैसा अविद्वान् मनुष्य जगत् में नाममात्र मनुष्य कहाता है।।१३।।

इसलिये विद्या पढ़ए विद्वान् धर्मात्मा होकर निर्वैरता से सब प्राणियों के कल्याण का उपदेश करे। और उपदेश में वाणी मधुर और कोमल बोले। जो सत्योपदेश से धर्म की वृद्धि और अधर्म का नाश करते हैं वे पुरुष धन्य हैं।।१४।।

नित्य स्नान, वस्त्र, अन्न, पान, स्थान सब शुद्ध रक्खे क्योंकि इन के शुद्ध होने में चित्त की शुद्धि और आरोग्यता प्राप्त होकर पुरुषार्थ बढ़ता है। शौच उतना करना योग्य है कि जितने से मल दुर्गन्ध दूर हो जाये।

संकलनकर्ताः- प0 महेंद्र कुमार आर्य, पूर्व प्रधान, आर्य समाज मंदिर सूरजपुर, ग्रेटर नोएडा, जिलाः- गौतमबुद्धनगर हैं।