वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के समय पर गुर्जर विरोधी होने का भाजपा पर तमंगा लगा हुआ था, किंतु जैसे जैसे लोकसभा चुनाव संपन्न हुए कई बडे गुर्जर नेता भाजपा में शामिल हो गए

 





नरेंद्र सिंह भाटी के लिए यह चुनौती भी होगी कि आखिर कैसे दादरी में मिहिर भोज प्रकरण से दूर होते जा रहे वोट बैंक को भाजपा में वापस लाया जाए?

 



 


सपा में हुए इस नुकसान ही भारपाई किए जाने की जिम्मेदारी फकीरचंद नागर, राजकुमार भाटी और जिलाध्यक्ष इंदर प्रधान जैसे नेताओं के कंधों पर आ टिकी

 



नरेंद्र सिंह भाटी एक पुराने नेता रहे हैं, उनके चले जाने से कमी जरूर खलेगी,किंतु वोट बैंक पर कोई खास फर्क नही पडेगा। चुनाव कोई भी हो दल बदल का खेल चलता ही हैः रोहित बैंसोया प्रवक्ता जिला समाजवादी पार्टी गौतमबुद्धनगर

 


मौहम्मद इल्यास-’’दनकौरी’’/गौतमबुद्धनगर

गौतमबुद्धनगर लोकसभा का सपा के टिकट पर चुनाव लड चुके व सपा के विधान परिषद सदस्य नरेंद्र सिंह भाटी के भाजपा में चले जाने से आखिर भाजपा को क्या फायदा होगा और सपा को क्या नुकसान है? वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के समय पर गुर्जर विरोधी होने के भाजपा पर एक तरह से तमंगा लगा हुआ था। किंतु जैसे जैसे लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ कई बडे गुर्जर नेता भाजपा में शामिल हो गए। इनमें पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य नरेंद्र सिंह भाटी के अनुज बिजेंद्र सिंह भाटी और पूर्व करागार मंत्री वेदराम भाटी तक ने उस समय भाजपा को दामन थाम लिया था। इनमें वेदराम भाटी अब भी भाजपा में हैं मगर बिजेंद्र सिंह भाटी भाजपा को बाय बाय कह कर हाथी की सवारी कर चुके हैं। सपा के राज्य सभा सदस्य सुरेंद्र सिंह नागर सपा की साईकिल से उतर कर भाजपा को पहले ही दामन थाम चुके हैं। अब खुद विधान परिषद सदस्य नरेंद्र सिंह भाटी भी सपा को बाय बाय कहते हुए भाजपा के रथ पर सवार हुए हैं। कभी नरेंद्र सिंह भाटी की सपा की सरकार में खासी तूती बोलती थी। नरेंद्र िंसंह भाटी, सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी रहे हैं। किंतु यह भी सच है कि जब आईएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन हुआ था, सूबे की सरकार ही नहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक मीडिया के निशाने पर आ गए थे और इससे सरकार की जमकर किरकिरी हुई थी। सपा के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सपा खेवनहार नरेंद्र सिंह भाटी का कद एक तरह सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की नजरों में कम हो चुका था।  इसी के चलते हुए अखिलेश यादव ने नरेंद्र सिंह भाटी के बजाय सुरेंद्र सिंह नागर को ज्यादा तवज्जों देने की जरूरत महसूस की और हुआ ऐसा ही सुरेंद्र सिंह नागर बसपा छोड कर सपा में आए और फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के खेवनहार बन गए। गौतमबुद्धनगर की बात करें तो सुरेंद्र सिंह नागर के सपा में रहते हुए नरेंद्र सिंह भाटी एक तरह से मौन ही रहे। जैसे की मीडिया में चर्चा है कि सपा विधान परिषद सदस्य नरेंद्र सिंह भाटी ने सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव से समय मांगा मगर ऐसा नही होने से खफा हुए और फिर सपा को बाय बाय कह कर भाजपा का दामन थाम लियां। बात चाहे कुछ भी हो मगर सपा नेतृत्व द्वारा अनदेखी को नरेंद्र सिंह भाटी बर्दाश्त नही कर पाए और भाजपा की ओर रूख कर ही लिया। आज के भाजपाई नरेंद्र सिंह भाटी दादरी के पूर्व विधायक स्व0 महेंद्र सिंह भाटी के बाद दूसरे बडे गुर्जर चेहरे रहे, यही कारण रहा है कि सिकंद्राबाद विधानसभा क्षेत्र से नरेंद्र सिंह भाटी जनता दल और फिर सपा के टिकट 3-3 पर पर विधायक चुने गए। बसपा का हाथी जब चला तो नरेंद्र सिंह भाटी, सिकंद्राबाद से वेदराम भाटी के सामने चुनाव हार गए। इसके बाद नरेंद्र सिंह भाटी एक बार भी न तो विधानसभा चुनाव और न ही लोकसभा चुनाव जीत पाए। हां नरेंद्र सिंह भाटी के सामने सिकंद्राबाद से बसपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले वेदराम भाटी को बसपा सरकार में करारागार मंत्री बनाया गया। किंतु इन सबके बाद नरेंद्र सिंह भाटी, मुलायम सिंह यादव के लिए फिर भी खास थे जब मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी  तो कृषि सलाहकार बना दर्जा मंत्री स्तरीय रूतबे से नवाजा गया। तत्पश्चात सपा ने ही उन्हें विधानसभा परिषद सदस्य बनवाया। नरेंद्र सिंह भाटी एक प्रभावशाली और कद्दावर नेता जरूर रहें हैं मगर क्या भाजपा में आने से उन्हें कोई फायदा, यह तो भविष्य ही बताएगा? किंतु गुर्जर नेताओं की पहले ही भाजपा में इतनी भरमार हैं तालमेल बिठाना थोडा मुश्किल सा लगता है। एक तरफ राज्य सभा सासंद सुरेंद्र सिंह नागर, वहीं दूसरी ओर पूर्व मंत्री वेंदराम भाटी, दादरी विधायक मास्टर तेंजपाल नागर और पुराने भाजपाईयों में लाल बहादुर गन्ना संस्थान के अध्यक्ष नवाब सिंह नागर समेंत दर्जनों नेता शामिल हैं। हां नरेंद्र सिंह भाटी के भाजपा में आने से  गुर्जर सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के प्रकरण से गुर्जर समाज पैदा हुई नाराजगी को कुछ हद तक दूर हो सकती है। नरेंद्र सिंह भाटी के लिए यह चुनौती भी होगी कि आखिर कैसे दादरी में मिहिर भोज प्रकरण से दूर होते जा रहे वोट बैंक को भाजपा में वापस लाया जाए। अब बात यदि सपा की करें तों बिजेंद्र सिंह भाटी फिर सुरेंद्र सिंह नागर और अब खुद नरेंद्र सिंह भाटी ने सपा को बाय बाय कह भाजपा का दामन थामा इससे सपा एक  तरह से गौतमबुद्धनगर में नेतृत्वविहीन सी ही दिखाई दे रही हैं। इन नेताओं से सपा से चले के बाद जिनता नुकसान होगा उसकी भरपाई करना थोडा मुश्किल हैं। सपा में हुए इस नुकसान ही भारपाई किए जाने की जिम्मेदारी फकीरचंद नागर, राजकुमार भाटी और जिलाध्यक्ष इंदर प्रधान जैसे नेताओं के कंधों पर आ टिकी हैं। वैसे सपा का परापंरागत वोट बैंक मुस्लिम माना जाता हैं किंतु नरेंंद्र सिंह भाटी के चले जाने के बाद मुस्लिम किधर जाए एक तरह मुस्लिमों के सामने असमंजस की स्थिति होगी। सूरजपुर से चौधरी हाजी ननका सैफी मुस्लिमों के एक बडे चेहरे माने जाते थे, किंतु फिलहाल मुस्लिमों को ओर सपा की ओर से खींच सके अभी तक कोई भी ऐसा मुस्लिम चेहरा गौतमबुद्धनगर में दिखाई नही दे रहा है। एक बार चर्चा चली थी कि सपा का जिलाध्यक्ष मुस्लिम घोषित होगा मगर वह भी सब हवा हवाई साबित हुई। गौतमबुद्धनगर जिला समाजवादी पार्टी प्रवक्ता रोहित बैंसोया ने कहा कि नरेंद्र सिंह भाटी एक पुराने नेता रहे हैं, उनके चले जाने से कमी जरूर खलेगी,किंतु वोट बैंक पर कोई खास फर्क नही पडेगा। चुनाव कोई भी हो दल बदल का खेल चलता ही है, इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2022 सिर हैं। कई नेता दल बदल कर रहे हैं दूसरी पर्टियों के नेता सपा में आ रहे हैं और जिससे सपा दिन दिनों मजबूत हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अभी कई बडे नेता भी दूसरे दलों से सपा में आने वाले हैं, उससे गौतमबुद्धनगर में सपा और अधिक मजबूत होकर उभरेगी। इस बार चुनाव में अखिलेश भैया की बाईसकिल चलेगी और जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर सपा इतिहास रचेगी।

 

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