इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की लचर हालत पर जमकर लताड लगाई 



मौहम्मद इल्यास/उत्तर प्रदेश

कोरोना महामारी से पूरा देश जूझ रहा है और अस्पतालों में बगैर ऑक्सीजन, बैड और दवाओं के लोग दम तोड रहे हैं। वहीं यूपी सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को त्वरित लाभ दिलाने का ढिढोरा पीट रही है मगर हकीकत इससे कोसो दूर हैं। यूपी के शो विंडो माने जाने गौतमबुद्धनगर के बिलासपुर कसबे में प्राथमिक स्वास्थ्य केंंद्र पर महामारी के इस दौर में ताला लटका होने की खबर खूब मीडिया की सुर्खिया बन रही हैं और साथ ही दादरी क्षेत्र खंडेरा गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बिल्डिंग के लावारिस हालत में पहुचने की खबरें में भी खूब आम हैं। हाल में सीएम योगी गौतमबुद्धनगर आए और कोविड-19 काल में व्यवस्थओं का जायजा लेते हुए अफसरों की पीठ थपथपा कर चले गए और हो भी क्यों न अफसरों ने सीएम योगी को ऐसे गांव का दौरा कराया जहां पहले से ही तैयारियां कर रखी थी कि यदि सीएम को कोविड-19 महामारी की ताजा हालत का जायजा लेना ही था तो अफसर उन्हें ऐसे गांवों में ले जाते जहां सरकारी ताम झामों के अभावों में कितने की मरीज बीमारी से दम तोड चुके हैं। चिकित्स और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की बात करें तो जाए किसान नेता स्व0 राजेश पायलट के गांव बैदपुरा में जहां स्वास्थ्य केंंद्र के चोरों और जलभराव होता दिखाई देता है और जाइए दादपूपुर गांव में जहां उप स्वास्थ्य केंद्र लावारिस हालत में खडा हुआ है। गौतमबुद्धनगर ही नही बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की यही तस्वीर नजर आती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे की लचर हालत पर जमकर लताड लगाई है। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस अजीत कुमार की डिवीजन ने कहा है कि छोटे शहरों और गांवों से संबंधित राज्य की पूरी चिकित्सा प्रणाली राम भरोसे है। कोर्ट ने यह टिप्पणी मेरठ जिले के एक जिला अस्पताल से कोविड-19 रोगी के लापता होने के मामले में की है। गौरतलब है कि 64 वर्षीय संतोष कुमार 22 अप्रैल को जिला अस्पताल मेरठ से लापता हो गया। तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा की गई जांच में यह बात सामने आई कि उस दिन जब मरीज वाशरूम गया तो वहीं बेहोश हो गया। जूनियर रेजिडेंट डा0् तूलिका जो नाइट ड्यूटी पर थीं, उन्होंने बताया कि डा0 अंशु जिनकी नाइट ड्यूटी थी वो ड्यूटी पर मौजूद नहीं थे। जूनियर रेजिडेंट डा0 तूलिका ने यह भी कहा कि संतोष कुमार को बेहोशी की हालत में स्ट्रेचर पर लाया गया और उसे होश में लाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने दम तोड़ दिया और जब उसे होश में लाने का प्रयास किया जा रहा था तब तक सुबह 8 बजे की टीम आ चुकी थी। इससे पहले कोर्ट ने इस मामले में रिपोर्ट मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि यह उस समय ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों की ओर से की गई लापरवाही का मामला है। एक मरीज को डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की पूरी देखभाल में अस्पताल में भर्ती कराया जाता है और अगर डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ इस तरह के आकस्मिक दृष्टिकोण को अपनाते हैं तो यह कृत्य लापरवाही दिखाता है और यह गंभीर कदाचार का मामला है क्योंकि इस तरह निर्दोष लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। बेंच ने राज्य सरकार को जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को भी कहा है। कोर्ट सरकार को उन आश्रितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है, जिन्हें इस तरह की लापरवाही के कारण अपूरणीय क्षति हुई है। कोर्ट ने आदेश दिया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य उत्तर प्रदेश सरकार को इस मामले में जिम्मेदारी तय करते हुए एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया जाता है। मुख्य सचिव की ओर से एक हलफनामा भी दायर किया जाएगा कि सरकार का क्या रुख है और वे मृतक के आश्रितों को किस तरह से मुआवजा देंगे। आवश्यक अनुपालन हलफनामा एक सप्ताह के भीतर दायर किया जाए।