देश गरीब हो गया, लगभग 25 साल पीछे चला गया। जब सब कुछ लूट जाएगा, भागा भागा फिरते रहना




दिन निकला, फिर सूरज छुप गया, आई रात सुहानी, सपने देखना छोड़ दो, देशवासियों दोबारा नहीं आती है, जवानी

 




चौधरी शौकत अली चेची


---------------------------वोट, टैक्स और जीएसटी कानून का पालन करें जनता, मौज मनाएं कानून बनाएं सत्ताधीश। लेकिन आसानी से नहीं मिलता सत्ता का सुख। बेरोजगारी, महंगाई, मंदी, आत्म हत्याएं और हत्याएं, भ्रष्टाचार, अत्याचार तथा बलात्कार अपने चरम पर है। आपसी प्रेम और भाईचारा गया भाड में अब तो नफरत फैला कर राजनीति की चासनी पक रही है। औलिया, पैगंबर, देवी देवता, महापुरुषों, शूरवीर और पवित्र धर्म स्थलों तथा धर्म ग्रंथों तक को गंदी राजनीति में घसीटा जाता है। मोदी राज में देश कितना तरक्की गया है इसी से पता चल जाता है कि सरकारी संस्थाएं लगभग 55 प्रतिशत निजीकरण की भेंट चढ गईं। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और जय जवान, जय किसान के इन नारों की खिल्लियां उंडाई जा रही हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया या तो गूंगा बहरा चुका है या फिर सरकार के गुणगान में लगा हुआ है, जिसे गोदी मीडिया के नाम से जाना जा रहा है। 80 प्रतिशत मीडिया हाउस सरकार की जी हूजुरी में लगे हुए हैं, इन्हें न जनता से कोई सरोकार है और न ही लोकंतत्र की मजबूती से। सरकार के भोंपू बन चुके ये 80  प्रतिशत चैनल और अखबार विपक्षी और जनता को ही निशान पर लिए रहते हैं। जब कि एक स्वस्थ चौथे स्तंभ का मूल कर्तव्य है कि जनता या फिर विपक्षी से आने वाले मुद्दों और सवालों को सरकार और सत्ता के सामने उठाया जाए और सरकार से सवालों को पूछा जाए। अब यदि थोडा बहुत भरोसा बचा है तो वह है कि सोशल मीडिया। सोशल मीडिया पर न्यूज बेवसाईट, यूट्यूब चैनल, फेसबुक आदि जारिए कुछ सच्चाई पल्ले पड जाती है। इस तरह मात्र 20 प्रतिशत पत्रकार और बुद्विजीवी सच्चाई के साथ सोशल मीडिया पर अपना धर्म निभा रहे हैं। यही कारण है कि देश की लगभग 60 प्रतिशत जनता असलियत से कोसों दूर है। यदि बात कर्तव्य की जाए तो पैसेंजर गाड़ियां, देश का किसान, सीमा का जवान ,परचून की दुकान पर बिकता हुआ सामान, बीमार को ठीक करता हुआ डॉक्टर किसी को भी जाति धर्म से नहीं देखता या पूछता है?  वे सब अपना कर्म करते हैं और फिर सबसे बड़ा धर्म समानता और मानवता है। कुछ सालों से सत्ता में काबिज होने के लिए गंदी राजनीति की जाती रही है। क्या सरकार की घिनौनेपन की हद नही थी कि तबलीगी जमातियों को कोरोना बम बना कर, एनआरसी और सीएए का विरोध करने वालों को बैकफुट पर फेंक दिया। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान गरीब, मजदूर, बेसहारा लोगों को भूख प्यास बेरोजगारी में सड़कों पर छोड दिया गया। उस समय कितने की लोग पैदल चलते हुए भूख और प्यास से मौत के मुंह में चले गए। कोविड-19 यानी बात कोरोना महामारी की जाए तो 1 साल बीत गया। वैक्सीन भी आ गई और देश में टीकाकरण अभियान भी अपने चरम पर है। किंतु इन सबके बावजूद 2 गज दूरी, मॉक्स जरूरी, ताली- थाली ,घंटी, मोमबत्ती टॉर्च आदि बजाया, जलाया मगर जालिम कोराना नहीं भाग पाया। अब फिर कोरोना सडकों पर खुलेआम दौड रहा है और पहले वाले दिन फिर आ रहे हैं जब हम सब घेरों में बंद थे। खैर कोरोना ही नही बल्कि बीमारी चाहे जो भी सरकार को बचाव के उपाय तो करने ही चाहिए और सरकार ने लॉकडाउन लगा कर और ताली थाली आदि टंटेबाजी करावा ऐसा सब कुछ किया भी था और कर भी रही है। कोरोना पर हमें सरकार का विरोध बिल्कुल नही करना है। मगर कुछ सवाल ऐसे हैं जिनसे सरकार पीछा नही छुडा सकती। जैसे पश्चिमी बंगाल में चुनावी रैलियों और सभाओं में जुडी रही भीड से क्या कोरोना डर कर उल्टे पांव भाग गया है। उत्तराचंल के हरिद्वार कुंभमेले में लाखों की भीड में कोरोना नही गया। कुंभ मेले की ताजा खबरें तो आनी भी शुरू हो गई हैं, जहां कई संत कोरोना की चपेट में हैं और खबरों में आया है कि जिनमें एक महामंडलेश्वर की दुखद मौत कोरोना से हाल में ही हुई है। क्या ये सब कोरोना बम नही है? पीएम केयर्स फंड का पैसा कहां गायब हो गया? वैक्सीन लगाने पर भी कोरोना नहीं डर रहा, चुनावी रैली व उद्घाटन को देखकर कोरोना कोसों दूर भाग जाता है। कोरोना भयंकर बीमारी है या कुछ और समझना मुश्किल है, मगर ऐसा लग रहा है कृषि बिल का विरोध सभी फसलों पर एमएसपी गारंटी कानून बने किसान आंदोलन को समाप्त करने का फार्मूला तैयार हो रहा है या नई खिचड़ी पक रही है। इंतजार है तो सिर्फ 5 राज्यों में चुनाव जीतने का है वैसे देश गरीब हो गया, लगभग 25 साल पीछे चला गया। जब सब कुछ लूट जाएगा, भागा भागा फिरते रहना, दिन निकला, फिर सूरज छुप गया, आई रात सुहानी, सपने देखना छोड़ दो, देशवासियों दोबारा नहीं आती है, जवानी।

लेखकः. चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।