पश्चिमी बंगाल में माहौल बन चुका है, समझना  होगा, ईवीएम, पावर, पैसा भाजपा का कितना साथ देता है?

 


चौधरी शौकत अली चेची


-----------------------------देश में कोई रोया निजी स्वार्थ में तो कोई रोया अपने दर्द को लेकर और कोई रोया सब के अधिकार के लिए किंतु समझना पड़ेगा इंसाफ कौन करेगा? एम.एस.पी. थी, है और रहेगी फिर गारंटी कानून बनाने में दिक्कत  क्यों है। अन्नदाता देश के हर कोने में खड़ा सड़क पर खून के आंसू रो रहा है मगर सरकार है कि पसीज ही नही रही। इतना नही किसानों को अलगाववादी, पाकिस्तानी, खालिस्तानी, देशद्रोही तक कह दिया गया और दर्जनों मुकदमें लाद कर सरकार ने अपने मंसूबे भी साफ कर दिए गए कि लोकतंत्र नही बल्कि जो भी अपने विचारों को व्यक्त करें या फिर सरकार की अलोचना करें तो वह सब देशद्रोही की श्रेणी में ही ला दिया जाएगा। ऐसा लगा रहा है कि अब भाजपा सरकार के लिए खतरे की घंटी बज रही है। नरेंद्र मोदी सरकार ने इन 6 सालों के दरम्यान कितने ही कानून बनाए और इनमें ज्यादातर का जनता व विपक्ष द्वारा विरोध किया गया। कृषि कानून वापस नहीं लिए जाने की बात करें तो कृषि बिल में बड़ा घोटाला  नजर आता है। कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020, राज्य सरकारों को मंडियों के बाहर की गई कृषि उपज की बिक्री और खरीद पर टैक्स लगाने से रोकता है और किसानों को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देता है। सरकार का कहना है कि इस बदलाव के जरिए किसानों और व्यापारियों को किसानों की उपज की बिक्री और खरीद से संबंधित आजादी मिलेगी, जिससे अच्छे माहौल पैदा होगा और दाम भी बेहतर मिलेंगे। यही नही इस अध्यादेश से किसान अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी भी व्यक्ति या संस्था को बेच सकते हैं। इस अध्यादेश में कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी मंडियों) के बाहर भी कृषि उत्पाद बेचने और खरीदने की व्यवस्था तैयार करना है। इसके जरिए सरकार एक देश, एक बाजार की बात कर रही है। मगर इस नए अध्यादेश के तहत किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन के रह जाएगा। केंद्र सरकार कृषि का पश्चिमी मॉडल किसानों पर थोपना चाहती है लेकिन सरकार यह बात भूल जाती है कि किसानों की तुलना विदेशी किसानों से नहीं हो सकती क्योंकि हमारे यहां भूमि-जनसंख्या अनुपात पश्चिमी देशों से अलग है और यहां खेती-किसानी जीवनयापन करने का साधन है, वहीं पश्चिमी देशों में यह व्यवसाय है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से किसानों का शोषण होता है। पिछले साल गुजरात में पेप्सिको कम्पनी ने किसानों पर कई करोड़ का मुकदमा किया था जिसे बाद में किसान संगठनों के विरोध के चलते कंपनी ने वापस ले लिया था। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत फसलों की बुआई से पहले कंपनियां किसानों का माल एक निश्चित मूल्य पर खरीदने का वादा करती हैं लेकिन बाद में जब किसान की फसल तैयार हो जाती है तो कम्पनियां किसानों को कुछ समय इंतजार करने के लिए कहती हैं और बाद में किसानों के उत्पाद को खराब बता कर रिजेक्ट कर दिया जाता है। समझने की बात यह है कि देश में 85 प्रतिशत लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है यानी यह अध्यादेश बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है। कंपनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। इस बदलाव से कालाबाजारी घटेगी नहीं बल्की जमाखोरी बढ़ेगी। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी 1972 में


मंडी एक्ट लेकर आए थे। मंडी में औने पौने दामों पर फसल की कीमत न तय हो, इसकी व्यवस्था इसमें थी, लेकिन नीति असफल होती गई। इससे सरकार के हाथ में खाद्यान नियंत्रण नहीं रहेगा, सबसे बड़ा खतरा यही है। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बदलाव करके निजी हाथों में खाद्यान्न जमा होने की इजाजत दे दी है। अब सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। कोरोना संकट के बीच यह नियंत्रण सरकार के हाथों था इसलिए लोगों को कम से कम अनाज को लेकर दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। अब इससे धीरे-धीरे कृषि से जुड़ी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही चौपट हो जायेगी। निजी व्यापारी सप्लाई चेन को अपने हिसाब से तय करते हैं और मार्केट को चलाते हैं, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा। मीडिया चौथा खंभा विश्वास खो चुका है विरोधियों को हमेशा दोषी मानना ज्यादा दिन नहीं चलता। सबका साथ, सबका विकास, हाथी के दांत खाने के और और दिखाने के और हैं। आजाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों में से सबसे ज्यादा प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुई किंतु अब उनकी लोकप्रियता का ग्राफ निरंतर गिरता ही रहा है। किसानों का हित का नही बल्कि बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ, नारी शक्ति यह सभी बातें खोखली साबित हो रही हैं। पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी क्या एक नारी नही है फिर क्यों चुनावी रण को जीत में बदलने के लिए सरकार और भाजपा संगठना ऐसे घेरे हुए है जैसे अभिमन्यु को महाभारत के युद्ध में अधर्मियों ने घेर लिया था। इससे तो ऐसा ही लग रहा है कि भाजपा अब कृषि कानून ही नही बल्कि हर ओर से शुरू हो चुके विरोध के बीच फंस कर रह गई है। भाजपा को हराने के लिए अन्नदाता सीना ताने खड़ा है और जिससे अब इनके वादे और इरादे हवा में उड़ते नजर आ रहे हैं। माहौल बन चुका है, समझना  होगा, ईवीएम, पावर, पैसा भाजपा का कितना साथ देता है?  अंत में जय जवान, जय किसान, भारत तिरंगा हम सबकी शान हम सबका भारत देश महान।

लेखकः- चौधरी शौकत अली चेची भारतीय किसान यूनियन ( बलराज  ) के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष  हैं।