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"यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप"

यज्ञ शब्द संस्कृत की युजिर् धातु से बनता है जिसका अर्थ है मेल 



आचार्य करणसिह /  नोएडा
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यज्ञ शब्द संस्कृत की युजिर् धातु से बनता है जिसका अर्थ है मेल अर्थात् यज्ञ का अंतिम लक्ष्य परमेश्वर की ओर ले जाता है ।उपनिषद कहती है-- यत्+ज्ञ जिससे ईश्वर जाना जाए वह विधि विधान यज्ञ कहलाता है। गीता ने यज्ञ को योग यज्ञ  कहकर पुष्टि की है। यज्ञ के अनेक अर्थों में परमेश्वर का नाम भी सम्मिलित है।" यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:" विद्वानों ने यज्ञ से परमेश्वर की पूजा की है। यज धातु के तीन अर्थ हैं। देव पूजा ,संगतिकरण, और दान गीता कहती हैकि यज्ञ करने की विधि वेदों में वर्णित है। यज्ञ कर्मकांड का सूक्ष्म अन्वेषण करें, तो सृष्टि के निर्माण और सृष्टि विद्या के रहस्यों को उजागर करता है। एतद वै ब्रघ्नस्य  विष्टपं यदोदनः। एतस्माद वा ओदनात् त्रयत्रयत्रिन्शतो लोकान् निरमिमीत प्रजापति: तेषाम् प्रज्ञानाय यज्ञमसृजत्।।अथर्व११//५०,५१,५३
यह प्राणशक्ति जो ब्रह्मांड का धारण कर रही है। प्रजापति ने इसी ओदनशक्ति से 33 लोको का निर्माण किया है। इन सब लोको को जानने के लिए यज्ञ का सृजन किया, और उनके दर्शनीय देवों का निर्माण किया। ऐसे ही यज्ञ की अन्य क्रियाएं भी आधि भौतिक या किसी आध्यात्मिक तत्व का ही निरूपण करती है। यज्ञ में आने का प्रयोजन- यज्ञ क्यों करें? यज्ञ में किसलिए आए? इसके लिए वेद वाणी कहती है ऋत धीतये आगत सत्य धर्माणौअध्र्वरम्।अग्ने पिवतजिह्वया।।३/५१/ 
हे सत्य धर्म से युक्त विद्वतजनों तुम ऋत को मनन करने के लिए यज्ञ में आओ। अग्नि की जिह्व्या से यज्ञ के रहस्यों को जानो। 
ऋतस्य धीति ब्राह्मणों मनीषाम्।।९/९७/73  प्रकृति के शाश्वत नियमों का चिंतन ब्रह्म का ही चिंतन है। रचना को देखकर रचियता का ज्ञान होना स्वभाविक है। ऋतस्य धीति  व्रजनानि हन्ति।।ऋ/२३/8 
ऋत का मनन् पापों को नष्ट कर देता है
सम्प्रेदौ अग्निजिह्वाभिरूदेतु हृदयादधि।।अथर्व//
 यह परमात्मा अग्नि अपनी अग्नि की प्रकाशमयी ज्वालाओं के साथ हृदय में प्रजज्वलित होवे। 
अथ देवयाजी  यो वेद दीवाने वाहमिदम् यत्रे।।शतपथ१११३
 जो व्यक्ति नानाविध सुख की प्राप्ति के लिए देवों का यजन करता है, वह देवयाजी कहलाता है।
  वा आत्याजी यो वेदेदं मे अनेनाङ्ग  उपधीयते(शतपथ)
 वह देवयाजी ही यज्ञ करते- करते आत्मयाजी बनता है,
और पूर्ण शांति को प्राप्त करता है। अर्थात् मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। इसीलिए हमें यज्ञ का अनुसरण अवश्य करना चाहिए ।कई लोग कहते हैं कि यज्ञ से क्या होता है? लेकिन महर्षि दयानंद जी कहते हैं -कि यज्ञ से जगत का जितना उपकार होता है उतना और किसी कार्य से नहीं होता है। अग्नि में जो हम घृत सामग्री आदि पदार्थ होम करते हैं ।उससे जो हवि बनती है, वह सभी का कल्याण करने वाली होती है ।अग्नि में भेदक शक्तिहोती है ।वह रुग्ण वायु को धक्का देकर बाहर कर देती है, और शुद्ध पवित्र प्राणों को सुरक्षित रखने वाली स्वास्थ्य को उत्तम बनाने वाली वायु को वहा जमा कर देती है। इसलिए यज्ञ  अवश्य करना चाहिए।  यज्ञ से सर्व कल्याण होता है। और विशेष रूप से हमें बातों की प्राप्ति होती है - वायु जल आदि की शुद्धि धन- धान्य की स्मृद्धि और  आत्मिक बल की  वृद्धि।  मानसिक शांति सामाजिक सद्भावना की वृद्धि।  पारिवारिक समन्वय की भावना। विश्व कल्याण शांति। यदि हम शांति स्थापित करना चाहते है, तो हमें यज्ञ अवश्य करना चाहिए ।यज्ञ के माध्यम से  सारे विश्व को शांति की तरफ बढ़ाया  जा सकता हैं अन्यथा और कोई ऐसा उपाय नहीं है। जिसके द्वारा विश्व मे शांति की जा सके। योगेश्वर श्रीकृष्ण जी आर्यावर्त के सभी राजाओं को यज्ञ  के माध्यम से ही एक झंडे के नीचे लाये थे। इसलिए अपने महापुरुषों के पद चिन्हों पर चलते हुए यज्ञों का अनुसरण करें और यज्ञ को अधिक से अधिक प्रचारित -प्रसारित करें ।अपने आप भी करें और दूसरों को भी करने की प्रेरणा दे।


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