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दाऊजी ने प्रज्वलित किया संस्कृति का दीप, सौ वर्ष बाद भी प्रज्वलित है पिहोवा की रामलीला


खाम्बी की ब्रजभूमि से पिहोवा तक पहुंची श्रीराम की भक्ति-परंपरा; एक शताब्दी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है लोकसंस्कृति की यह अमूल्य विरासत
मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ खाम्बी ब्रजभूमि (हरियाणा)
कुछ परंपराएं केवल समय के साथ नहीं चलतीं, बल्कि वे स्वयं समय की पहचान बन जाती हैं। कुछ दीप केवल प्रकाश नहीं देते, बल्कि पीढ़ियों को उनकी जड़ों, संस्कारों और संस्कृति का रास्ता दिखाते हैं। पिहोवा की श्री सरस्वती राम नाटक क्लब की रामलीला ऐसी ही एक सांस्कृतिक ज्योति है, जो वर्ष 1927 में प्रज्वलित हुई और आज अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुकी है।
यह कहानी केवल सौ वर्षों से चले आ रहे रामलीला मंचन की कहानी नहीं है। यह भक्ति की उस धारा की कहानी है, जो ब्रजभूमि के ग्राम खाम्बी से पिहोवा की धर्मनगरी तक पहुंची और जिसने मंच को मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकशिक्षा, संस्कार, भक्ति और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का माध्यम बना दिया।
इस परंपरा के केंद्र में एक ऐसा व्यक्तित्व खड़ा दिखाई देता है, जिसकी साधना ने आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत की नींव रखी—पंडित बलदेव दाऊजी।
खाम्बी की धरती से निकला संस्कृति का साधक
पंडित बलदेव दाऊजी की जन्मभूमि ग्राम खाम्बी रही, जिसे ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा में ‘खम्बवन’ से संबद्ध माना जाता है। ब्रज की मिट्टी में रची-बसी कृष्ण भक्ति, लोकपरंपरा और धार्मिक चेतना ने दाऊजी के व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।
उन्होंने श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं को केवल धार्मिक आख्यान के रूप में नहीं देखा, बल्कि उन्हें समाज के चरित्र निर्माण और लोकजीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना का माध्यम माना।
दाऊजी विभिन्न स्थानों पर जाकर श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं तथा बाल लीलाओं का सजीव लोकमंचन करते थे। उनके अभिनय में केवल संवाद नहीं होते थे, बल्कि भाव, भक्ति और आत्मीयता का ऐसा समन्वय होता था कि दर्शक स्वयं कथा का हिस्सा बन जाते थे।
विशेषकर श्रीराम का वनगमन, सीताहरण और जटायु महाराज के अंतिम समय में प्रभु श्रीराम से मिलन जैसे प्रसंग जब मंच पर प्रस्तुत होते थे तो वातावरण करुणा और भक्ति से भर जाता था। दर्शकों की आंखों से निकलने वाले आंसू इस बात के साक्षी बनते थे कि दाऊजी के लिए मंचन केवल अभिनय नहीं, बल्कि आत्मिक साधना था।
अभिनय नहीं, ईश्वर-स्मरण और समाज-संस्कार की साधना
दाऊजी के लिए रामलीला मंचन कला से कहीं आगे की चीज थी। वे इसे ईश्वर-स्मरण, लोकशिक्षा और समाज-संस्कार की साधना मानते थे।
अपने शिष्यों को वे केवल संवाद बोलना, अभिनय करना या पात्र निभाना नहीं सिखाते थे। वे उन्हें जीवन में परिश्रम, अनुशासन, सदाचार, सेवा और संवेदनशीलता का महत्व भी समझाते थे।
निर्धनों और असहायों के प्रति उनके हृदय में विशेष करुणा थी। यही कारण था कि उनके शिष्य उन्हें केवल गुरु या निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के एक स्नेही सदस्य के रूप में देखते थे।
उनके सुपुत्र पंडित गोपालदत्त शर्मा आज भी अपने पिता की स्मृतियों को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। उनके अनुसार दाऊजी की वाणी में मानो स्वयं मां सरस्वती का वास था। वे स्वयं रामलीला में भगवान श्रीराम की भूमिका निभाते थे और अपने शिष्यों को बच्चों की तरह स्नेह देते थे।
उनकी शिक्षा का मूल संदेश यही था कि मंच पर निभाया गया चरित्र केवल अभिनय तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन में भी उसके आदर्श दिखाई दें।
दाऊजी के शिष्यों ने संभाली परंपरा की मशाल
पंडित बलदेव दाऊजी की सांस्कृतिक साधना को आगे बढ़ाने वाले उनके शिष्यों में पंडित गंगाप्रसाद शर्मा, पंडित दुलीचंद जी, पंडित परसी अर्थात परशुराम जी, पंडित तोतीराम मास्टर जी, पंडित बालिकराम जी और पंडित गिरिराज मास्टर जी सहित अनेक नाम उल्लेखनीय रहे।
इन शिष्यों ने अलग-अलग समय पर इस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाया और रामलीला को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया।
यही वह परंपरा थी जिसने आगे चलकर पिहोवा में एक ऐसी रामलीला की नींव रखी, जो बदलते समय, बदलती तकनीक और बदलती मनोरंजन संस्कृति के बावजूद अपनी मूल आत्मा को बचाए रखने में सफल रही।
1927 में पिहोवा में रोपा गया सांस्कृतिक बीज
वर्ष 1927 इस पूरी यात्रा का ऐतिहासिक पड़ाव बना।
पंडित बलदेव दाऊजी ने पंडित कृष्ण जोशी को निर्देशक बनाकर पिहोवा में श्री सरस्वती राम नाटक क्लब की रामलीला का शुभारंभ कराया।
उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह छोटा-सा सांस्कृतिक प्रयास आने वाली एक सदी तक जीवित रहेगा और पिहोवा की पहचान का हिस्सा बन जाएगा।
लेकिन वह बीज धीरे-धीरे बढ़ता गया।
एक कलाकार दूसरे कलाकार से जुड़ा। एक परिवार की अगली पीढ़ी ने मंच संभाला। एक गुरु के बाद दूसरे गुरु ने जिम्मेदारी उठाई। और इस तरह रामलीला की यह परंपरा व्यक्तियों से निकलकर पीढ़ियों की सामूहिक विरासत बन गई।
जब इतिहास की आंधियां भी नहीं बुझा सकीं रामलीला की लौ
सौ वर्षों की यात्रा कभी आसान नहीं रही।
देश ने विभाजन की त्रासदी देखी। वर्ष 1947 के दंगे, सामाजिक उथल-पुथल, आर्थिक कठिनाइयां, वर्ष 1984 का कठिन दौर और फिर आधुनिक समय में कोरोना महामारी जैसी परिस्थितियों ने जनजीवन को प्रभावित किया।
इन कठिन दौरों में बहुत कुछ बदला।
लोग बदले। परिस्थितियां बदलीं। सामाजिक प्राथमिकताएं बदलीं। कलाकारों की संख्या में भी उतार-चढ़ाव आया।
लेकिन एक चीज नहीं बदली—श्रीराम की कथा के प्रति आस्था।
रामलीला का मंच कभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ। किसी न किसी रूप में कथा चलती रही और श्रीराम की मर्यादा, त्याग, करुणा और धर्म का संदेश पीढ़ियों तक पहुंचता रहा।
यही इस परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति है।
यहां कलाकार नहीं, पीढ़ियां मंच पर उतरती हैं
पिहोवा की इस रामलीला की सबसे अनूठी विशेषताओं में से एक इसकी पारिवारिक और पीढ़ीगत परंपरा है।
यहां केवल कलाकार नहीं बदलते, बल्कि परिवारों की पीढ़ियां मंच संभालती हैं।
पंडित नीलकंठ पौलस्त्य और पंडित कालीचरण अत्री जैसे कलाकारों को आज भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
नीलकंठ पौलस्त्य की तीसरी पीढ़ी के मयंक पौलस्त्य लंबे समय तक लक्ष्मण की भूमिका निभाते रहे। इसी परिवार की अगली पीढ़ी के सुभाष पौलस्त्य आज निर्देशन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इसी तरह करुण अत्री, अभिषेक जोशी, गोल्डी शांडिल्य, बिजेंद्र धीमान और अभिनव सहित अनेक कलाकार अपने पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
इसलिए इस रामलीला में कलाकारों के नामों की सूची वास्तव में एक सांस्कृतिक वंशावली है—जिसमें सौ वर्षों का इतिहास सांस लेता है।
आधुनिक दौर में भी नहीं बदली रामलीला की आत्मा
आज जब मनोरंजन के साधन घर-घर तक पहुंच चुके हैं और मंचीय प्रस्तुतियों में आधुनिक तकनीक, संगीत और आकर्षण का बोलबाला है, ऐसे समय में भी श्री सरस्वती राम नाटक क्लब ने अपनी मौलिक पहचान को बचाकर रखा है।
यहां कहानी को अनावश्यक नृत्य या गीतों के सहारे लंबा करने के बजाय भजनों, काव्यात्मक संवादों, भावप्रधान अभिनय और पारंपरिक प्रस्तुति शैली के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है।
यही सादगी इस रामलीला की ताकत है।
यहां मंच का उद्देश्य दर्शकों को केवल आकर्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें कथा के भाव से जोड़ना है।
श्रीराम का वनगमन केवल एक दृश्य नहीं रहता—वह त्याग और कर्तव्य का संदेश बन जाता है।
सीता हरण केवल कथा का प्रसंग नहीं रहता—वह धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक बन जाता है।
और जटायु का प्रसंग केवल अभिनय नहीं रहता—वह त्याग, निष्ठा और अंतिम सांस तक धर्म के लिए खड़े रहने की प्रेरणा बन जाता है।
लगभग 90 कलाकारों की स्मृतियां भी इस मंच का हिस्सा
सौ वर्षों की इस यात्रा में लगभग 90 कलाकार और 10 पदाधिकारी अब इस संसार में नहीं हैं।
लेकिन रामलीला का यह मंच उनकी स्मृतियों को आज भी अपने भीतर समेटे हुए है।
जिन कलाकारों ने कभी इस मंच पर संवाद बोले, जिन हाथों ने मंच सजाया, जिन्होंने पात्रों के वस्त्र तैयार किए, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर व्यवस्था संभाली—उन सभी का योगदान इस शताब्दी की कहानी का हिस्सा है।
इस दृष्टि से आज की रामलीला केवल वर्तमान कलाकारों का मंचन नहीं, बल्कि उन सभी दिवंगत कलाकारों और पदाधिकारियों को एक मौन श्रद्धांजलि भी है, जिन्होंने अपनी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा इस परंपरा को समर्पित किया।
खाम्बी से पिहोवा तक—दो स्थान, एक सांस्कृतिक आत्मा
इस पूरी कहानी में ग्राम खाम्बी का उल्लेख केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह पंडित बलदेव दाऊजी की जन्मभूमि रही।
यह गांव इस सांस्कृतिक यात्रा की जड़ों का प्रतीक है।
ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा में ‘खम्बवन’ से संबद्ध मानी जाने वाली यह भूमि सदियों से धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी रही है। इसी धरती पर जन्मे दाऊजी ने अपनी साधना के माध्यम से श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं को लोकमंच तक पहुंचाया।
और आज, संयोग ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्मीयता का विषय है कि खाम्बी की धरती से जुड़े पंडित भगवत प्रसाद शर्मा भारतीय संस्कृति, साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और जनजागरण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इस प्रकार खाम्बी केवल एक गांव का नाम नहीं रह जाता। वह इस कहानी में जड़ों और वर्तमान के बीच एक सांस्कृतिक सेतु बनकर सामने आता है।
एक ओर दाऊजी की जन्मभूमि, दूसरी ओर उनकी साधना से आगे बढ़ी रामलीला—और इनके बीच कई पीढ़ियों की सांस्कृतिक यात्रा।
11 अक्टूबर को फिर सजेगा श्रीराम का दरबार
अब एक बार फिर पिहोवा की धरती श्रीराम की कथा के मंचन की साक्षी बनने जा रही है।
11 अक्टूबर से रामलीला का मंच सजेगा।
पात्र सजेंगे।
संवाद गूंजेंगे।
भजन वातावरण को भक्तिमय बनाएंगे।
और एक बार फिर पिहोवा की धरती पर श्रीराम के आदर्शों की कथा जीवंत होगी।
लेकिन इस बार यह मंचन कुछ अधिक विशेष होगा।
क्योंकि यह केवल एक और रामलीला नहीं होगी।
यह शताब्दी वर्ष की रामलीला होगी।
यह उस दीप की शताब्दी होगी, जिसे वर्ष 1927 में पंडित बलदेव दाऊजी ने प्रज्वलित किया था।
यह उनके शिष्यों की तपस्या को नमन होगा।
यह उन कलाकारों को श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अपना जीवन इस मंच को दिया।
और यह उन परिवारों के प्रति सम्मान होगा, जिन्होंने अपनी कई पीढ़ियों को इस सांस्कृतिक परंपरा के लिए समर्पित किया।
एक दीप, जो सौ वर्ष बाद भी बुझा नहीं
सौ वर्षों की यात्रा में समय की आंधियां आईं।
कई मुश्किलें सामने आईं।
पीढ़ियां बदलीं।
कलाकार बदले।
समाज बदला।
मनोरंजन के साधन बदले।
लेकिन दाऊजी द्वारा प्रज्वलित संस्कृति का दीप आज भी जल रहा है।
यह दीप केवल पिहोवा की रामलीला का दीप नहीं है।
यह भारतीय लोकसंस्कृति की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जो आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों को नहीं भूलती।
सौ वर्ष बीत गए, लेकिन श्रीराम की कथा आज भी गूंज रही है।
दाऊजी की साधना आज भी जीवित है।
शिष्यों की परंपरा आज भी आगे बढ़ रही है।
पीढ़ियां आज भी मंच पर उतर रही हैं।
और पिहोवा की धरती पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सांस्कृतिक ज्योति आज भी प्रज्वलित है।
यही इस शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि है—
एक मंच बचा रहा, एक परंपरा बची रही और उसके साथ भारतीय संस्कृति की एक अमूल्य विरासत भी बची रही।

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