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प्रदूषण की बढ़ती चादर के बीच फेफड़ों की सेहत पर जीवनभर ध्यान जरूरी



विश्व फेफड़ा दिवस 2026: विशेषज्ञों ने चेताया—खांसी, सांस फूलना और घरघराहट को नजरअंदाज न करें

मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/  नोएडा (गौतमबुद्धनगर)

दिल्ली-एनसीआर में सितंबर के साथ मौसम में बदलाव और वायु गुणवत्ता में गिरावट के बीच फेफड़ों की सेहत एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सुबह के समय दिखाई देने वाली हल्की धुंध और बढ़ता वायु प्रदूषण सांस से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि फेफड़ों की देखभाल केवल बीमारी होने के बाद नहीं, बल्कि जीवन के हर चरण में जरूरी है।

विश्व फेफड़ा दिवस 2026 की थीम “A Lifetime of Lung Health” यानी “जीवनभर फेफड़ों का स्वास्थ्य” इसी संदेश को रेखांकित करती है कि बचपन से लेकर बुजुर्गावस्था तक फेफड़ों की सेहत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बढ़ता वायु प्रदूषण, धूम्रपान, वेपिंग और कार्यस्थल पर धूल-धुएं या अन्य हानिकारक पदार्थों के संपर्क के साथ बदलती जीवनशैली श्वसन स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रही है। अस्थमा, सीओपीडी, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी, निमोनिया और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण जैसी समस्याएं अलग-अलग आयु वर्गों में देखी जा रही हैं।

ओपीडी में सांस से जुड़ी शिकायतों वाले मरीज बड़ी संख्या में

यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा 110 के वरिष्ठ सलाहकार-पल्मोनोलॉजी डॉ. अरुणाचलम एम. के अनुसार, उनकी ओपीडी में लगभग 60–70 प्रतिशत मरीज फेफड़ों या सांस से संबंधित शिकायतों के साथ आते हैं। इनमें खांसी, सांस फूलना, घरघराहट और बार-बार होने वाले संक्रमण जैसी समस्याएं प्रमुख हैं।

उन्होंने बताया कि अस्थमा, सीओपीडी, श्वसन संक्रमण, एलर्जिक राइनाइटिस, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और नींद से संबंधित श्वसन विकार प्रमुख स्थितियों में शामिल हैं। उनके अनुसार फेफड़ों से संबंधित मरीजों में लगभग 60 प्रतिशत पुरुष और 40 प्रतिशत महिलाएं हैं।

डॉ. अरुणाचलम ने कहा कि मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों में लंबे समय से चली आ रही फेफड़ों की बीमारियां अधिक देखने को मिलती हैं, लेकिन बच्चे, धूम्रपान करने वाले तथा प्रदूषण या कार्यस्थल के जोखिमों के संपर्क में रहने वाले लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने तंबाकू से बचने, प्रदूषण का संपर्क कम करने, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया।

लगातार खांसी और सांस फूलना हो सकते हैं चेतावनी संकेत

यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, ओमेगा-1, ग्रेटर नोएडा के एचओडी-पल्मोनोलॉजी डॉ. (ब्रिगेडियर) सरविंदर सिंह ने बताया कि उनकी ओपीडी में लगभग 20–30 प्रतिशत मरीज सांस से जुड़ी समस्याओं के साथ आते हैं। इनमें अस्थमा, सीओपीडी, सांस संबंधी एलर्जी, बार-बार होने वाले छाती के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस, लंबे समय से रहने वाली खांसी, घरघराहट और सांस फूलना शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि सीओपीडी और धूम्रपान से जुड़ी फेफड़ों की समस्याएं पुरुषों में अधिक देखने को मिलती हैं, जबकि अस्थमा और सांस संबंधी एलर्जी पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

डॉ. सिंह ने विशेष रूप से कहा कि लगातार खांसी, सांस फूलना या घरघराहट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर चिकित्सकीय जांच से फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं की पहचान और उचित उपचार में मदद मिल सकती है।

सांस की बीमारी किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं

यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन के एचओडी-पल्मोनोलॉजी, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी एवं स्लीप मेडिसिन डॉ. पुनीत गुप्ता के अनुसार, उनकी ओपीडी में सांस संबंधी परेशानी लेकर आने वाले मरीजों में दमा, सांस की एलर्जी, बार-बार होने वाले संक्रमण, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी, लंबे समय से रहने वाली खांसी, सांस फूलना और घरघराहट जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं।

उन्होंने बताया कि मरीजों में पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर है। उनके अनुसार बढ़ता वायु प्रदूषण, धूम्रपान, कार्यस्थल पर धूल-धुएं का संपर्क और एलर्जी श्वसन संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं।

डॉ. गुप्ता ने लोगों से तंबाकू से दूर रहने, प्रदूषित हवा एवं धूल-धुएं के संपर्क को कम करने और शारीरिक रूप से सक्रिय रहने की अपील की। उन्होंने लंबे समय तक रहने वाली खांसी, सांस फूलने या घरघराहट होने पर समय पर डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी।

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के बीच अतिरिक्त सावधानी जरूरी

यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, मॉडल टाउन, दिल्ली के वाइस चेयरमैन एवं एचओडी-पल्मोनोलॉजी डॉ. इंदर मोहन चुघ ने कहा कि फेफड़ों का स्वास्थ्य सभी आयु वर्गों के लिए महत्वपूर्ण है और श्वसन संबंधी समस्याएं कम उम्र के मरीजों तथा धूम्रपान न करने वाले लोगों में भी देखने को मिल रही हैं।

उन्होंने बताया कि उनके पल्मोनोलॉजी ओपीडी में लगभग 80 प्रतिशत परामर्श सीओपीडी और ब्रोन्कियल अस्थमा से संबंधित होते हैं। मरीजों में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात लगभग 60:40 बताया गया, हालांकि यह बीमारी के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

डॉ. चुघ के अनुसार लगातार खांसी, सांस फूलना, घरघराहट, श्वसन संक्रमण और एलर्जी आम समस्याओं में शामिल हैं। लंबे समय से चली आ रही श्वसन संबंधी बीमारियों का बोझ 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक देखा जाता है, हालांकि बच्चे, धूम्रपान करने वाले, बुजुर्ग तथा प्रदूषण या कार्यस्थल संबंधी जोखिमों के संपर्क में रहने वाले लोग भी संवेदनशील हो सकते हैं।

उन्होंने दिल्ली-एनसीआर में खराब वायु गुणवत्ता के दौरान विशेष सावधानी बरतने तथा तंबाकू से बचने, प्रदूषण का संपर्क कम करने, नियमित शारीरिक गतिविधि, आवश्यक टीकाकरण और लगातार बने रहने वाले लक्षणों पर चिकित्सकीय जांच कराने की सलाह दी।

बचपन से शुरू हो फेफड़ों की देखभाल

विशेषज्ञों के अनुसार फेफड़ों की अच्छी सेहत के लिए स्वस्थ आदतों की शुरुआत बचपन से ही करना महत्वपूर्ण है। धूम्रपान और वेपिंग से दूरी, प्रदूषण एवं धूल-धुएं के अनावश्यक संपर्क को कम करना, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त नींद जैसी आदतें जीवनशैली का हिस्सा बनाई जानी चाहिए।

फेफड़ों से जुड़े लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना भी महत्वपूर्ण है। लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न या सांस लेते समय घरघराहट जैसे लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ से जांच कराना उचित कदम हो सकता है।

विश्व फेफड़ा दिवस का संदेश

विश्व फेफड़ा दिवस 2026 का संदेश यही है कि फेफड़ों की सेहत किसी एक मौसम या उम्र तक सीमित विषय नहीं है। प्रदूषण और बदलती जीवनशैली के दौर में फेफड़ों की देखभाल को रोजमर्रा की स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा बनाना और सांस से जुड़े लगातार बने रहने वाले लक्षणों को गंभीरता से लेना जरूरी है।


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