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SPECIAL STORY | दादरी में भाजपा टिकट की दौड़ में संजय विकल की दावेदारी, जानिए विकल परिवार की पूरी राजनीतिक विरासत


किसान नेता चौधरी रामचंद्र विकल से लेकर वर्तमान पीढ़ी के संजय विकल तक… दादरी की राजनीति में ‘विकल’ नाम की कहानी

रिपोर्ट: मौहम्मद इल्यास ‘दनकौरी’
Vision Live News / दादरी विधानसभा-62
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां लगातार तेज होती जा रही हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों में शामिल दादरी विधानसभा क्षेत्र संख्या-62 में भी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी से टिकट के लिए कई स्थानीय चेहरे अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।
इसी क्रम में संजय सिंह विकल भी दादरी विधानसभा से भाजपा टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूती से पेश कर रहे हैं। क्षेत्र में जनसंपर्क, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी और भाजपा से जुड़े आयोजनों में सक्रियता के जरिए संजय विकल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन संजय विकल की राजनीतिक पहचान केवल वर्तमान की सक्रियता तक सीमित नहीं है। उनके नाम के साथ जुड़ी सबसे बड़ी बात है विकल परिवार की राजनीतिक विरासत, जिसकी महत्वपूर्ण कड़ी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिग्गज किसान नेता और स्वतंत्रता सेनानी चौधरी रामचंद्र विकल रहे हैं।
ऐसे में दादरी की मौजूदा राजनीति में संजय विकल की दावेदारी को समझने के लिए विकल परिवार के राजनीतिक सफर को जानना भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
दादरी से भाजपा टिकट के लिए संजय विकल की दावेदारी
दादरी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का मजबूत संगठन और लगातार चुनावी सफलता इसे टिकट की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण सीट बनाती है। ऐसे में पार्टी के टिकट के लिए स्थानीय नेताओं और सामाजिक रूप से सक्रिय चेहरों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है।
संजय विकल इसी दौड़ में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।
उनकी गतिविधियों में क्षेत्र के लोगों से संपर्क, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी, पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद और स्थानीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
संजय विकल के समर्थकों का मानना है कि उनके सामने सबसे बड़ी ताकत उनका स्थानीय जुड़ाव और पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि है। वहीं राजनीतिक विश्लेषण के नजरिए से देखा जाए तो भाजपा जैसे बड़े संगठन में टिकट हासिल करने के लिए केवल राजनीतिक विरासत ही नहीं, बल्कि संगठन में सक्रियता, जनाधार, चुनावी क्षमता और पार्टी नेतृत्व का विश्वास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
फिलहाल भाजपा की ओर से दादरी विधानसभा सीट के लिए किसी उम्मीदवार की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए संजय विकल को भाजपा के संभावित दावेदार के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
चौधरी रामचंद्र विकल: जिस नाम से शुरू होती है विकल परिवार की राजनीतिक कहानी
संजय विकल की राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा चौधरी रामचंद्र विकल के बिना अधूरी मानी जाएगी।
चौधरी रामचंद्र विकल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और आजादी के बाद लंबे समय तक किसानों, मजदूरों और ग्रामीण समाज के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखते रहे।
उनका जन्म 8 नवंबर 1916 को दादरी क्षेत्र के बसंतपुर नया गांव में हुआ था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से ग्रामीण और किसान समाज की आवाज को आगे बढ़ाया।
1952 में दादरी से शुरू हुआ बड़ा राजनीतिक सफर
चौधरी रामचंद्र विकल के राजनीतिक जीवन का दादरी से सीधा और महत्वपूर्ण रिश्ता रहा।
वर्ष 1952 में वे दादरी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए।
यह वह दौर था जब देश स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान, सिंचाई, भूमि राजस्व और विकास से जुड़े सवाल बेहद महत्वपूर्ण थे।
रामचंद्र विकल ने इन मुद्दों को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया और धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान कायम की।
किसान राजनीति बनी पहचान
रामचंद्र विकल की राजनीति का सबसे मजबूत पक्ष किसान और ग्रामीण समाज के मुद्दे रहे।
सिंचाई, भूमि राजस्व, कृषि और ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर उन्होंने लगातार आवाज उठाई। यही कारण रहा कि वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल हुए।
उनकी राजनीतिक यात्रा दादरी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से निकलकर पूरे उत्तर प्रदेश और फिर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंची।
1967: उत्तर प्रदेश की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका
वर्ष 1967 उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव का साल था। इसी दौर में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार में चौधरी रामचंद्र विकल ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली।
वे उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और मंत्री के रूप में सरकार का हिस्सा रहे।
यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। दादरी क्षेत्र से निकलकर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष स्तर तक पहुंचना उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रभाव को दर्शाता है।
विधानसभा से संसद तक पहुंचा राजनीतिक सफर
रामचंद्र विकल की राजनीतिक यात्रा केवल उत्तर प्रदेश की विधानसभा तक सीमित नहीं रही।
वे 1971 में बागपत लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। इसके बाद वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
इस प्रकार उनके राजनीतिक जीवन में विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा तक का सफर देखने को मिलता है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी भूमिका निभाई और कई प्रमुख नेताओं के साथ राजनीतिक रूप से काम किया।
किसान-मजदूर और पिछड़े वर्गों की आवाज
रामचंद्र विकल के राजनीतिक जीवन की पहचान किसान और ग्रामीण समाज के हितों से गहराई से जुड़ी रही।
राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनके किसान-मजदूर और पिछड़े वर्गों के हितों से जुड़े कार्यों का उल्लेख मिलता है।
उनकी राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रही, बल्कि कृषि, सिंचाई, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे भी उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रहे।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में संस्थागत विकास से जुड़े उनके योगदान का भी उल्लेख मिलता है।
यही राजनीतिक विरासत आगे चलकर ‘विकल’ नाम को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पहचान देने वाली बनी।
कैप्टन सुधीर विकल: राजनीति से विमानन तक
विकल परिवार की अगली पीढ़ी में कैप्टन सुधीर विकल का नाम अलग क्षेत्र में पहचान रखता है।
सुधीर विकल विमानन क्षेत्र से जुड़े अनुभवी पायलट के रूप में जाने जाते हैं। उनके बारे में सार्वजनिक स्तर पर यह जानकारी सामने आती रही है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की VVIP उड़ानों से जुड़े पायलट दल का हिस्सा रहे हैं।
VVIP उड़ानों में पायलट की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसमें विमान संचालन के साथ-साथ मौसम, तकनीकी स्थिति, उड़ान मार्ग, समय और सुरक्षा प्रोटोकॉल का विशेष ध्यान रखना होता है।
हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर सुधीर विकल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मुख्य अथवा निजी पायलट कहना उचित नहीं होगा। अधिक सटीक रूप से उन्हें मुख्यमंत्री की VVIP उड़ानों से जुड़े पायलट के रूप में प्रस्तुत किया जाना बेहतर है।
अब संजय विकल की बारी: विरासत से वर्तमान राजनीति तक
विकल परिवार की राजनीतिक कहानी अब वर्तमान पीढ़ी में एक नए अध्याय की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
संजय सिंह विकल दादरी विधानसभा क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं और भाजपा से टिकट की दावेदारी पेश कर रहे हैं।
उनके लिए सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी में एक तरफ क्षेत्र से जुड़ाव और दूसरी तरफ चौधरी रामचंद्र विकल की राजनीतिक विरासत शामिल है।
हालांकि राजनीति में विरासत अपने आप में टिकट की गारंटी नहीं होती। किसी भी राजनीतिक दल के लिए उम्मीदवार का संगठनात्मक योगदान, जनसंपर्क, स्थानीय स्वीकार्यता, चुनावी क्षमता और पार्टी नेतृत्व के साथ समन्वय जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं।
संजय विकल के सामने भी यही चुनौती है कि वे अपनी पारिवारिक पहचान को वर्तमान दौर की जमीनी राजनीति और संगठनात्मक सक्रियता में किस तरह बदलते हैं।
दादरी में 2027 की चुनावी बिसात
दादरी विधानसभा क्षेत्र में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से राजनीतिक समीकरण बनने लगे हैं।
भाजपा के टिकट के लिए कई स्थानीय चेहरे अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। हर दावेदार अपने राजनीतिक संपर्क, सामाजिक आधार और संगठनात्मक सक्रियता को पार्टी नेतृत्व के सामने मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
इसी क्रम में संजय विकल की दावेदारी भी चर्चा में है।
उनके सामने एक ओर विकल परिवार की ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत है तो दूसरी ओर आज की चुनावी राजनीति की कठिन प्रतिस्पर्धा।
अब देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में संजय विकल अपनी दावेदारी को कितना मजबूत कर पाते हैं और पार्टी संगठन के भीतर उनका राजनीतिक प्रभाव किस स्तर तक पहुंचता है।
विकल परिवार की तीन अलग-अलग पहचान
अगर विकल परिवार की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा को तीन प्रमुख नामों में समझें तो तस्वीर कुछ इस प्रकार दिखाई देती है—
चौधरी रामचंद्र विकल
स्वतंत्रता सेनानी | किसान नेता | विधायक | उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री/मंत्री | लोकसभा सांसद | राज्यसभा सदस्य
उन्होंने किसान और ग्रामीण समाज की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
कैप्टन सुधीर विकल
विमानन क्षेत्र से जुड़े अनुभवी पायलट | VVIP उड़ानों से जुड़ी पेशेवर भूमिका
उन्होंने राजनीति से अलग विमानन क्षेत्र में अपनी पेशेवर पहचान बनाई।
संजय सिंह विकल
सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय चेहरा | दादरी विधानसभा-62 से भाजपा टिकट के दावेदार
वे अब परिवार की विरासत को वर्तमान राजनीतिक दौर में आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल: क्या भाजपा लगाएगी संजय विकल पर दांव?
दादरी विधानसभा-62 में भाजपा के टिकट की दौड़ आने वाले समय में और दिलचस्प हो सकती है।
संजय विकल की दावेदारी के साथ सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकल परिवार की राजनीतिक विरासत, स्थानीय जनसंपर्क और मौजूदा राजनीतिक सक्रियता उन्हें भाजपा के टिकट तक पहुंचा पाएगी?
या फिर पार्टी नेतृत्व किसी दूसरे स्थानीय या संगठनात्मक रूप से मजबूत चेहरे पर भरोसा जताएगा?
इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।
फिलहाल इतना जरूर है कि दादरी की राजनीति में संजय विकल ने भाजपा टिकट की दौड़ में अपना नाम मजबूती से दर्ज करा दिया है।
अब नजरें भाजपा संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के अगले फैसले पर हैं।
दादरी की राजनीति में ‘विकल’ नाम की पुरानी विरासत और संजय विकल की नई राजनीतिक पारी—2027 में यह कहानी किस मोड़ पर पहुंचती है, यह देखना दिलचस्प होगा।


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