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निजी अस्पताल में इलाज में लापरवाही के आरोप, कोर्ट ने FIR के दिए आदेश; पुलिस को एक सप्ताह में कार्रवाई रिपोर्ट देने के निर्देश



   मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ ग्रेटर नोएडा
एक निजी अस्पताल में उपचार के दौरान कथित चिकित्सकीय लापरवाही से जुड़े मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्धनगर की अदालत ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। अदालत ने धीरेन्द्र बनाम निजी अस्पताल प्रबंधन आदि मामले में धारा 173(4) बीएनएसएस के तहत दाखिल प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए थाना बीटा-2 पुलिस को संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में अभियोग (FIR) दर्ज कर नियमानुसार विवेचना करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पुलिस को की गई कार्रवाई से न्यायालय को एक सप्ताह के भीतर अवगत कराने को कहा गया है।
यह आदेश 12 अगस्त 2026 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्धनगर की अदालत द्वारा पारित किया गया।
ऑपरेशन के बाद लगातार दर्द का आरोप
अदालत के समक्ष दिए गए प्रार्थना पत्र के अनुसार, प्रार्थी धीरेन्द्र की पत्नी राखी को पेट में दर्द की शिकायत थी। जांच में पित्ताशय की थैली में पथरी होने की बात सामने आई थी। इसके बाद 30 मई 2025 को उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 31 मई 2025 को लेप्रोस्कोपिक कोलेसिस्टेक्टोमी ऑपरेशन किए जाने का उल्लेख प्रार्थना पत्र में किया गया है।
प्रार्थी का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद उसकी पत्नी को लगातार पेट और कंधे में तेज दर्द रहा। आरोप के मुताबिक, दर्द को सामान्य पोस्ट-ऑपरेटिव दर्द बताते हुए उपचार किया गया और बाद में मरीज को डिस्चार्ज कर दिया गया।
प्रार्थी के अनुसार, घर जाने के बाद भी दर्द की स्थिति बनी रही और चिकित्सकीय सलाह पर दर्द निवारक इंजेक्शन लगाए गए। इसके बावजूद राहत नहीं मिलने पर मरीज को दोबारा अस्पताल ले जाना पड़ा।
दूसरी पथरी और पेट में फ्लूड मिलने का दावा
प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया कि 4 जून 2025 को दोबारा अस्पताल में भर्ती होने के बाद एमआरसीपी समेत अन्य जांच कराई गईं। प्रार्थी के अनुसार, बाद में एक अन्य चिकित्सक से रिपोर्ट दिखाने पर उन्हें बताया गया कि पित्ताशय से एक पथरी ही निकाली गई थी, जबकि दूसरी पथरी तथा पेट में फ्लूड मौजूद था।
प्रार्थी ने आरोप लगाया कि इस स्थिति की जानकारी होने के बावजूद संबंधित चिकित्सकों और अस्पताल प्रबंधन द्वारा मामले को छिपाने का प्रयास किया गया। हालांकि, ये आरोप फिलहाल प्रार्थी के दावे हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि पुलिस विवेचना के दौरान होनी है।
दिल्ली के निजी अस्पताल में दोबारा सर्जरी का दावा
प्रार्थी के अनुसार, 5 जून 2025 को उसकी पत्नी की हालत गंभीर बताई गई, जिसके बाद उसे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया। वहां चिकित्सकों द्वारा पेट में फ्लूड लीक होने की बात बताए जाने का दावा प्रार्थना पत्र में किया गया है।
प्रार्थना पत्र के अनुसार, वहां उपचार के दौरान 6 जून 2025 को दोबारा सर्जरी की गई, जिसमें पित्ताशय का शेष हिस्सा और एक पथरी निकाले जाने का दावा किया गया है। प्रार्थी का कहना है कि इसके बाद उसकी पत्नी को पेट और कंधे के दर्द में राहत मिली।
अधिकारियों से शिकायत के बाद कोर्ट पहुंचा मामला
प्रार्थी के मुताबिक, घटना के बाद उसने 3 जुलाई 2025 को थाना बीटा-2 में शिकायत दी। इसके बाद पुलिस उपायुक्त, जिलाधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भी शिकायतें दी गईं।
प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि मामले की जांच के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी स्तर से कमेटी गठित की गई थी। प्रार्थी ने जांच प्रक्रिया और रिपोर्ट को लेकर भी आपत्तियां दर्ज कराईं और आरोप लगाया कि शिकायत के बावजूद उसे अपेक्षित कानूनी कार्रवाई नहीं मिली। इसके बाद उसने न्यायालय का रुख किया।
अदालत ने मेडिकल रिकॉर्ड को बताया महत्वपूर्ण
अदालत ने सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से लगाए गए आरोपों, संलग्न चिकित्सकीय दस्तावेजों और थाना रिपोर्ट का अवलोकन किया।
आदेश में कहा गया कि मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए मूल उपचार पत्रावली, ऑपरेशन नोट, डिस्चार्ज समरी, अल्ट्रासाउंड, एमआरसीपी, सीटी स्कैन, पैथोलॉजी रिपोर्ट, ऑपरेशन से संबंधित अभिलेख तथा दूसरे अस्पताल में किए गए उपचार एवं सर्जरी से जुड़े दस्तावेजों की जांच आवश्यक होगी।
अदालत ने चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Jacob Mathew बनाम State of Punjab & Anr. (5 अगस्त 2005) में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया।
प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध की जांच आवश्यक: कोर्ट
अदालत ने आदेश में कहा कि प्रार्थना पत्र के साथ प्रस्तुत अभिलेखों, चिकित्सकीय दस्तावेजों और प्रार्थी के कथनों के अवलोकन से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के संबंध में जांच किए जाने की आवश्यकता परिलक्षित होती है।
अदालत के अनुसार मामले की सत्यता विवेचना के माध्यम से ही स्पष्ट हो सकती है। इसी आधार पर न्यायालय ने प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए पुलिस विवेचना कराया जाना उचित माना।
पुलिस को FIR दर्ज कर एक सप्ताह में रिपोर्ट देने के निर्देश
अदालत ने थाना बीटा-2 के थानाध्यक्ष को निर्देश दिया कि मामले में संलिप्त बताए गए व्यक्तियों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर नियमानुसार विवेचना कराई जाए और की गई कार्रवाई से न्यायालय को एक सप्ताह के भीतर अवगत कराया जाए।
अब पुलिस द्वारा FIR दर्ज किए जाने के बाद मामले में चिकित्सकीय रिकॉर्ड, ऑपरेशन से जुड़े दस्तावेज, संबंधित चिकित्सकों के बयान, मेडिकल विशेषज्ञों की राय और अन्य साक्ष्यों की जांच की जाएगी। आरोपों की वास्तविकता और किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण विवेचना एवं आगे की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होगा।
⚖️ महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति
यह FIR दर्ज कर विवेचना कराने का न्यायालयी आदेश है, दोषसिद्धि का फैसला नहीं। प्रार्थना पत्र में लगाए गए चिकित्सकीय लापरवाही एवं अन्य आरोप फिलहाल आरोप मात्र हैं। संबंधित चिकित्सकों, अस्पताल प्रबंधन अथवा अन्य व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण पुलिस विवेचना, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

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