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टेट अनिवार्यता के विरोध में शिक्षकों का उबाल: मशाल जुलूस निकालकर बुलंद की आवाज, सरकार को दी आंदोलन की चेतावनी


मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/ गौतमबुद्धनगर 
टेट (Teacher Eligibility Test) परीक्षा को अनिवार्य बनाए जाने के विरोध में शिक्षकों का आक्रोश सड़कों पर खुलकर सामने आया। अखिल भारतीय संयुक्त शिक्षक महासंघ के तत्वाधान में जनपद में एक विशाल मशाल जुलूस निकाला गया, जिसमें सैकड़ों की संख्या में शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भाग लेकर अपनी एकजुटता और विरोध दर्ज कराया।
यह मशाल जुलूस जिला पंचायत कार्यालय से प्रारंभ होकर जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय तक पहुंचा, जहां शिक्षकों ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए अपनी मांगों को प्रशासन के समक्ष रखा। हाथों में मशाल और बैनर लिए शिक्षकों का समूह पूरे मार्ग में नारेबाजी करता हुआ आगे बढ़ा, जिससे माहौल पूरी तरह आंदोलनमय बना रहा।
नारों से गूंजा शहर, शिक्षकों ने दिखाई एकता
जुलूस के दौरान “सेवा सुरक्षा कैसे पाई—संघर्षों से, बलिदानों से”, “इसकी रक्षा कौन करेगा—हम करेंगे, हम करेंगे” तथा “नो टेट, विफोर आरटीई एक्ट” जैसे नारों से पूरा वातावरण गूंज उठा। शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि टेट की अनिवार्यता उनके अधिकारों का हनन है और इसे जबरन थोपना न्यायसंगत नहीं है।
नेतृत्व में दिखी मजबूती, कई संगठन आए एक मंच पर
मशाल जुलूस का नेतृत्व उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के प्रदेश ऑडिटर नरेश कौशिक, जिला अध्यक्ष विनोद नागर, अटेवा के जिलाध्यक्ष रविंदर सिंह, नरेंद्र कसाना, पूर्व माध्यमिक विद्यालय शिक्षक संघ की अध्यक्ष शीला पवार, प्राथमिक शिक्षा मित्र संघ के जिला अध्यक्ष जगवीर भाटी, TSCT मंडल संयोजक जितेंद्र नागर, एससी/एसटी शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष राकेश कुमार, जूनियर शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष निरंजन नागर, महामंत्री बीरेन्द्र कुमार विश्वकर्मा और महिला उपाध्यक्ष नीरज चौबे सहित विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों ने किया।
इन सभी संगठनों की एकजुटता ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि टेट अनिवार्यता के मुद्दे पर शिक्षक वर्ग अब व्यापक स्तर पर आंदोलन के लिए तैयार है।
केंद्र सरकार से कानून वापस लेने की मांग
प्रदर्शन के दौरान शिक्षकों ने केंद्र सरकार से मांग की कि आगामी मानसून सत्र में लोकसभा में विधेयक लाकर टेट अनिवार्यता को समाप्त किया जाए। शिक्षकों का कहना है कि यह “काला कानून” केवल शिक्षकों पर लागू किया गया है, जो असंवैधानिक होने के साथ-साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश के लगभग 25 लाख शिक्षकों पर इस तरह का नियम थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। शिक्षकों ने मांग की कि आरटीई एक्ट के तहत बनाए गए मूल प्रावधानों का पालन करते हुए टेट की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
शिक्षकों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो वे दिल्ली और लखनऊ की सड़कों पर बड़ा आंदोलन करने को बाध्य होंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल राष्ट्र निर्माता ही नहीं, बल्कि सरकार की आंख और चेतना भी हैं, इसलिए उनकी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बड़ी संख्या में सहभागिता, मजबूत संदेश
मशाल जुलूस में बड़ी संख्या में शिक्षक-शिक्षिकाएं शामिल हुए, जिससे यह आंदोलन एक मजबूत जनआंदोलन के रूप में उभरता नजर आया। पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन और संगठनात्मक शक्ति का भी विशेष प्रदर्शन देखने को मिला।
विश्लेषण (Vision Live)
यह विरोध प्रदर्शन केवल एक परीक्षा के खिलाफ आंदोलन नहीं, बल्कि शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा व्यापक मुद्दा बनता जा रहा है। विभिन्न संगठनों का एक मंच पर आना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। सरकार के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि संवाद और समाधान के बिना इस असंतोष को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा।