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मकर संक्रांति : इतिहास, अर्थ, महत्व एवं सांस्कृतिक विरासत


मकर संक्रांति संक्षिप्त तथ्य
त्योहार का नाम: मकर संक्रांति
तिथि: 14 जनवरी 2026 (बुधवार)
अनुयायी: हिन्दू, बौद्ध
खगोलीय कारण: सूर्य का धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश
अन्य नाम: उत्तरायण, पोंगल, संक्रांति, टीला संक्रांत
मकर संक्रांति का अर्थ एवं इतिहास
मकर संक्रांति एक प्राचीन वैदिक पर्व है, जिसका संबंध सूर्य की गति, ऋतु परिवर्तन और कृषि चक्र से है। यह पर्व उस विशेष खगोलीय क्षण का प्रतीक है जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होते हैं और मकर राशि में प्रवेश करते हैं। शास्त्रों में सूर्य को समस्त भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है।
भारत में यह पर्व हजारों वर्षों से मनाया जा रहा है। मकर संक्रांति का उल्लेख वेदों, पुराणों एवं महाभारत जैसे महाग्रंथों में मिलता है। यह एक ऐसा पर्व है जो धर्म, विज्ञान और प्रकृति – तीनों को एक सूत्र में पिरोता है।
मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथाएं
1. सूर्य और शनि की कथा
मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने उनके घर जाते हैं। शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए यह दिन विशेष रूप से मकर संक्रांति कहलाता है। यह कथा पिता-पुत्र के संबंधों में सामंजस्य और क्षमा का प्रतीक मानी जाती है।
2. गंगा अवतरण की कथा
इसी दिन मां गंगा कपिल मुनि के आश्रम से होकर भागीरथ से मिली थीं। इसी कारण गंगा स्नान का इस दिन विशेष महत्व है।
3. भीष्म पितामह की महानता
महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त होने के कारण उत्तरायण की प्रतीक्षा की और मकर संक्रांति के दिन अपने प्राण त्यागे। यह दिन त्याग, व्रत और धर्मनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
4. राजा महाबली की कथा
दक्षिण भारत में पोंगल पर्व से जुड़ी यह कथा राजा महाबली की है, जिन्हें भगवान विष्णु ने सत्य, दान और न्यायप्रियता के कारण विशेष स्थान दिया। यह कथा समृद्धि और सामाजिक समानता का संदेश देती है।
मकर संक्रांति का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
धार्मिक महत्व
सूर्य देव, भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और गंगा माता की पूजा
स्नान, दान, जप और व्रत से पुण्य प्राप्ति
तिल-गुड़ का दान एवं सेवन, जिससे आपसी वैमनस्य दूर होता है
वैज्ञानिक महत्व
उत्तरायण के बाद सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं
सर्दी धीरे-धीरे कम होने लगती है
शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
कृषि एवं सामाजिक महत्व
भारत एक कृषि प्रधान देश है और मकर संक्रांति नई फसलों के आगमन का उत्सव है। इस समय किसान खरीफ फसलों को घर लाते हैं और रबी की फसल खेतों में लहलहाने लगती है। अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह पर्व ग्रामीण और शहरी जीवन को जोड़ता है।
मकर संक्रांति कैसे मनाई जाती है
स्नान एवं दान
नदियों, तालाबों या सागर में प्रातःकाल स्नान कर दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।
पूजन एवं व्रत
सूर्य देव, गंगा माता और शिवजी की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु इस दिन व्रत भी रखते हैं।
खिचड़ी एवं तिल-गुड़
खिचड़ी, तिल, गुड़, रेवड़ी, गजक और मूंगफली का विशेष महत्व है।
पतंग उत्सव
विशेषकर गुजरात और राजस्थान में पतंग उड़ाना सूर्य की आराधना और उल्लास का प्रतीक है।
भारत के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति
तमिलनाडु: पोंगल
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल: संक्रांति
बिहार: टीला संक्रांत
पंजाब: लोहड़ी (एक दिन पूर्व)
गुजरात: उत्तरायण (पतंग महोत्सव)
मकर संक्रांति की सांस्कृतिक भावना
तिल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ यह संदेश देती हैं कि जीवन में चाहे कितनी भी कड़वाहट हो, हमें मधुरता और एकता बनाए रखनी चाहिए। यह पर्व सामाजिक समरसता, प्रकृति सम्मान और आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक है।
लेखक परिचय
महामंडलेश्वर आचार्य अशोकानंद जी महाराज
पीठाधीश्वर – तीर्थ क्षेत्र बिसरख धाम
आचार्य अशोकानंद जी महाराज सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति एवं वैदिक परंपराओं के प्रख्यात विद्वान एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शक हैं। वे धार्मिक साहित्य, पर्व-त्योहारों के सांस्कृतिक अर्थ तथा समाज में आध्यात्मिक चेतना जागृत करने हेतु निरंतर लेखन एवं प्रवचन करते रहे हैं। उनके लेख सरल भाषा में गहन शास्त्रीय भाव को प्रस्तुत करते हैं।
कानूनी डिस्क्लेमर (Legal Disclaimer)
यह लेख धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक मान्यताओं पर आधारित है। इसमें वर्णित कथाएं एवं जानकारियां विभिन्न ग्रंथों, लोक परंपराओं एवं आस्थाओं से संकलित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय, संप्रदाय या विचारधारा की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। पाठकगण इसे श्रद्धा, सांस्कृतिक अध्ययन एवं सामान्य जानकारी के रूप में ग्रहण करें।