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33 साल का संघर्ष, संगठन की जड़ें और आंदोलनों की लंबी कहानी… चौधरी राजे कसाना के सियासी सफर में फिर दिखा पुराना भाजपा कुनबा


वैदपुरा में नवाब सिंह नागर की मौजूदगी ने ताजा की भाजपा के उस दौर की यादें, जब दादरी-नोएडा सीट से लेकर डीएनडी तक आंदोलनों में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते थे पुराने कार्यकर्ता

मौहम्मद इल्यास- "दनकौरी"/  ग्रेटर नोएडा
ग्राम वैदपुरा में वरिष्ठ भाजपा नेता राजे कसाना के आवास पर एक बार फिर ऐसा राजनीतिक संगम देखने को मिला, जिसने गौतम बुद्ध नगर की भाजपा की पुरानी सियासी तस्वीर को सामने ला दिया। भाजपा के पश्चिम क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर जब राजे कसाना के आवास पर पहुंचे तो वहां मौजूद कई पुराने चेहरे अचानक उस दौर की राजनीतिक यादों को जीवंत करते नजर आए, जब भाजपा गौतम बुद्ध नगर में अपनी मजबूत जमीन तैयार करने के लिए संघर्ष कर रही थी।
सुनील भाटी, मुकेश नागर, इंद्र नागर और विजय नागर समेत कई ऐसे नेता इस मुलाकात में मौजूद रहे, जो वर्ष 1996 से 2007 के बीच नवाब सिंह नागर के विधायक रहने के दौर में भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर भाजपा संगठन को मजबूत करने में सक्रिय रहे थे। इन पुराने साथियों की मौजूदगी ने इस मुलाकात को महज एक शिष्टाचार भेंट से कहीं अधिक राजनीतिक महत्व दे दिया।
इसी पुराने राजनीतिक कुनबे में राजे कसाना का नाम भी उन नेताओं में शुमार किया जाता है, जिन्होंने करीब 33 वर्षों तक भाजपा की राजनीति में संगठन, आंदोलन और जनहित के मुद्दों को लेकर अपनी सक्रियता बनाए रखी।
जब दादरी-नोएडा से कालिंदी कुंज तक थी एक ही विधानसभा
आज गौतम बुद्ध नगर में दादरी और नोएडा अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों के रूप में अपनी राजनीतिक पहचान रखते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब दादरी-नोएडा विधानसभा क्षेत्र का दायरा दादरी से लेकर कालिंदी कुंज तक माना जाता था।
इसी दौर में नवाब सिंह नागर ने भाजपा के लिए राजनीतिक जमीन तैयार की। वह इस विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रहे और पांच बार विधानसभा चुनाव लड़े। भाजपा संगठन से जुड़े पुराने कार्यकर्ताओं के मुताबिक, उस समय सीमित संसाधनों और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों के बीच पार्टी का संगठन खड़ा करना आसान नहीं था।
नवाब सिंह नागर के नेतृत्व में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की टीम ने गांव-गांव जाकर संगठन को विस्तार देने का काम किया। इसी राजनीतिक दौर में भाजपा ने पहली बार इस क्षेत्र में अपनी मजबूत चुनावी मौजूदगी दर्ज कराई और दादरी-नोएडा विधानसभा क्षेत्र में कमल खिलाने में सफलता हासिल की।
आज जब नवाब सिंह नागर भाजपा के पश्चिम क्षेत्र के अध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, तब वैदपुरा में उनके पुराने साथियों के साथ हुई मुलाकात ने उसी राजनीतिक यात्रा के एक महत्वपूर्ण अध्याय को फिर चर्चा में ला दिया है।
राजे कसाना: संगठन से आंदोलन तक 33 साल का सफर
राजे कसाना की राजनीतिक पहचान केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही। उनका सफर संगठन के निचले स्तर से शुरू होकर प्रदेश स्तर तक पहुंचा।
उन्होंने भाजपा के बिसरख ब्लॉक अध्यक्ष के रूप में संगठन की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद वह भारतीय जनता युवा मोर्चा, गौतम बुद्ध नगर के जिला उपाध्यक्ष रहे।
संगठन में सक्रिय भूमिका के बाद राजे कसाना को भाजपा किसान मोर्चा की प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता और प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य जैसी जिम्मेदारियां भी मिलीं।
इसके अलावा उन्होंने भारतीय आतंकवाद विरोधी संगठन, गौतम बुद्ध नगर के जिला अध्यक्ष और जनहित मोर्चा, गौतम बुद्ध नगर के जिला अध्यक्ष के रूप में भी काम किया।
यानी राजे कसाना की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा संगठनात्मक जिम्मेदारियों और जनहित से जुड़े आंदोलनों के इर्द-गिर्द घूमता रहा।
जब प्राधिकरणों के धन को लेकर छिड़ा था बड़ा आंदोलन
राजे कसाना के राजनीतिक सफर का एक महत्वपूर्ण अध्याय वह दौर भी रहा, जब गौतम बुद्ध नगर के प्राधिकरणों से जुड़े धन के मुद्दे को लेकर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला था।
राजे कसाना और उनके साथियों ने आरोप लगाया कि उस दौर में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार के द्वारा नोएडा प्राधिकरण से 500 करोड़ रुपये, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से 500 करोड़ रुपये और यमुना प्राधिकरण से 500 करोड़ रुपये लेकर किसी अन्य क्षेत्र में धन लगाए जाने की तैयारी की जा रही है।
इस मुद्दे को लेकर भाजपा नेताओं ने आंदोलन का रास्ता अपनाया।
आंदोलन के दौरान नोएडा प्राधिकरण की ओर से 100 करोड़ रुपये भेजे जाने की बात सामने आई, जबकि शेष राशि को लेकर भी प्रक्रिया चल रही थी। लेकिन भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के आंदोलन ने इस मुद्दे को व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बना दिया और दूसरे प्राधिकरणों से धन भेजे जाने की कवायद पर रोक लगने का दावा किया गया।
यह आंदोलन उस दौर में गौतम बुद्ध नगर की राजनीति में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि पहली बार प्राधिकरणों से जुड़े आर्थिक अधिकारों और क्षेत्र के विकास के पैसे को लेकर स्थानीय स्तर पर इतना बड़ा राजनीतिक दबाव बनाया गया था।
स्टांप ड्यूटी और बिजली दरों के खिलाफ भी सड़क पर उतरे
राजे कसाना की राजनीति का एक दूसरा पक्ष भी रहा—जनता से सीधे जुड़े आर्थिक मुद्दों पर आंदोलन।
उस दौर में स्टांप ड्यूटी बढ़ाने की कवायद और बिजली की दरों में बढ़ोतरी को लेकर भी विरोध शुरू हुआ। राजे कसाना और उनके साथियों ने सरकार के इन फैसलों के खिलाफ आवाज बुलंद की।
भाजपा नेताओं ने इन फैसलों को आम लोगों, किसानों और क्षेत्र के निवासियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला बताते हुए आंदोलन किया।
लगातार विरोध और राजनीतिक दबाव के बाद सरकार को अपने कुछ प्रस्तावों पर पीछे हटना पड़ा—ऐसा दावा उस समय आंदोलन से जुड़े नेताओं की ओर से किया गया।
21 हजार आवंटियों के लिए ‘जीरो पीरियड’ की लड़ाई
राजे कसाना और उनके साथियों के राजनीतिक संघर्ष में यमुना प्राधिकरण के करीब 21 हजार आवंटियों का मुद्दा भी खास महत्व रखता है।
आवंटियों पर भारी-भरकम ब्याज लगाए जाने के फैसले के खिलाफ भाजपा नेताओं ने आंदोलन किया। उनका तर्क था कि जिन परिस्थितियों में परियोजनाओं और विकास कार्यों में देरी हुई, उसका पूरा आर्थिक बोझ आवंटियों पर डालना उचित नहीं है।
इस मुद्दे को लेकर आंदोलन तेज हुआ और लंबे संघर्ष के बाद आवंटियों को ‘जीरो पीरियड’ का लाभ दिलाने की दिशा में सफलता मिलने का दावा किया गया।
राजे कसाना के राजनीतिक सफर में यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसका सीधा संबंध हजारों ऐसे परिवारों से था, जिन्होंने प्राधिकरण की योजनाओं में अपने भविष्य का निवेश किया था।
डीएनडी टोल आंदोलन बना सबसे बड़ा जनआंदोलन
गौतम बुद्ध नगर की राजनीति के इतिहास में डीएनडी टोल का मुद्दा लंबे समय तक चर्चा में रहा है।
नोएडा और दिल्ली के बीच रोजाना आवागमन करने वाले हजारों लोगों पर टोल का आर्थिक बोझ था। इसे लेकर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आंदोलन का रास्ता अपनाया।
राजे कसाना और उनके साथियों ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। आंदोलन धीरे-धीरे जनभावना से जुड़ता चला गया और डीएनडी टोल को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ता गया।
आंदोलनकारियों के अनुसार, लगातार संघर्ष का परिणाम यह रहा कि डीएनडी टोल ब्रिज को टोल मुक्त कराने में सफलता मिली।
गौतम बुद्ध नगर की राजनीति में इस आंदोलन को भाजपा के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं के उन संघर्षों में गिना जाता है, जिनका सीधा असर आम जनता की जेब और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा।
नवाब सिंह नागर और राजे कसाना की मुलाकात क्यों है खास?
वैदपुरा में हुई यह मुलाकात इसलिए खास है क्योंकि यहां सिर्फ वर्तमान भाजपा संगठन के नेता नहीं थे, बल्कि भाजपा के उस पुराने दौर के कई चेहरे एक साथ दिखाई दिए, जब संगठन विस्तार के लिए गांव-गांव और सड़क-सड़क संघर्ष किया जाता था।
एक तरफ आज नवाब सिंह नागर भाजपा पश्चिम क्षेत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके साथ पुराने दौर में काम करने वाले कार्यकर्ता आज भी अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक भूमिकाओं में सक्रिय दिखाई देते हैं।
राजे कसाना का आवास ऐसे ही पुराने राजनीतिक रिश्तों का एक पड़ाव बनता दिखाई दिया।
वनवास’ के बाद क्षेत्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचे नवाब सिंह नागर
नवाब सिंह नागर की राजनीतिक यात्रा भी उतार-चढ़ाव से भरी रही है। लंबे राजनीतिक अनुभव के बाद अब वह भाजपा के पश्चिम क्षेत्रीय अध्यक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
उनकी वर्तमान भूमिका और पुराने साथियों के साथ उनकी सहजता यह बताती है कि राजनीति में पद बदल सकते हैं, जिम्मेदारियां बदल सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक साथ चलने वाले राजनीतिक रिश्ते अपनी अलग पहचान बनाए रखते हैं।
वैदपुरा में राजे कसाना के आवास पर नजर आया पुराना भाजपा कुनबा इसी राजनीतिक विरासत की तस्वीर पेश करता है।
तीन दशक बाद भी कायम है रिश्तों की सियासत
राजनीति में अक्सर चुनाव, पद और टिकट चर्चा का केंद्र होते हैं, लेकिन संगठन की असली ताकत उन कार्यकर्ताओं से बनती है जो वर्षों तक पार्टी के साथ खड़े रहते हैं।
राजे कसाना की 33 वर्षों की राजनीतिक यात्रा इसी बात का उदाहरण पेश करती है।
बिसरख ब्लॉक अध्यक्ष से लेकर युवा मोर्चा, किसान मोर्चा और प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियों तक पहुंचने के बाद भी उनका राजनीतिक जुड़ाव स्थानीय मुद्दों और संगठनात्मक सक्रियता से बना रहा।
वहीं नवाब सिंह नागर के साथ उनका पुराना राजनीतिक रिश्ता आज भी दिखाई देता है।
वैदपुरा की इस मुलाकात में मौजूद पुराने चेहरों ने एक तरह से यह संदेश दिया कि राजनीति में पद और समय बदलते रहते हैं, लेकिन संघर्ष के दौर में बने रिश्ते लंबे समय तक कायम रहते हैं।
और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है—
कमल आज मजबूत नजर आ रहा है, लेकिन इसकी जड़ें उन कार्यकर्ताओं के संघर्ष में हैं, जिन्होंने तीन दशक पहले मुश्किल दौर में संगठन को सींचा था।


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