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मोहर्रम (ताजिया) – शहादत, त्याग और सत्य की जीत का प्रतीक

✍️ लेखक: चौधरी शौकत अली चेची
🕌 मोहर्रम (ताजिया) मनाने का मुख्य उद्देश्य
मोहर्रम इस्लाम धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण महीना है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि बलिदान, त्याग, सत्य और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की जीवंत मिसाल है। विशेष रूप से 10वीं तारीख (आशूरा) को हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया जाता है।
मुख्य उद्देश्य:
सत्य की रक्षा: इमाम हुसैन ने अत्याचार के सामने झुकने के बजाय सत्य का साथ दिया।
बलिदान और त्याग: उन्होंने अपने परिवार सहित इस्लाम और मानवता की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए।
अन्याय के खिलाफ आवाज: मोहर्रम हमें सिखाता है कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होना जरूरी है।
धार्मिक आस्था और एकता: यह पर्व लोगों को एकजुट करता है और इंसानियत का संदेश देता है।
📅 इस्लामिक कैलेंडर और मोहर्रम
इस्लामिक (हिजरी) कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित होता है।
हिजरी वर्ष की शुरुआत मुहर्रम से होती है।
वर्ष 622 ईसवी में पैगंबर मोहम्मद साहब की मक्का से मदीना हिजरत से इसका आरंभ हुआ।
इसमें 12 महीने होते हैं और एक साल लगभग 354–355 दिनों का होता है।
👉 वर्ष 1448 हिजरी का आरंभ 17 जून 2026 से माना गया।
👉 भारत में 2026 में ताजिया जुलूस 26 जून (आशूरा) को निकाले गए।
⚔️ कर्बला की ऐतिहासिक घटना
इस्लामिक इतिहास के अनुसार, 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला में एक महान संघर्ष हुआ।
यजीद ने खुद को खलीफा घोषित किया और अत्याचार करने लगा।
हजरत इमाम हुसैन ने उसकी बैअत (आज्ञाकारिता) से इंकार कर दिया।
कर्बला के मैदान में उनके काफिले को रोक दिया गया और पानी तक बंद कर दिया गया।
72 साथियों के साथ उन्होंने 80,000 की सेना का सामना किया।
10 मोहर्रम (आशूरा) के दिन इमाम हुसैन शहीद हो गए।
👉 यह घटना सत्य बनाम असत्य की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है।
😢 मातम और ताजिया की परंपरा
मोहर्रम के दौरान लोग इमामबाड़ों में जाकर मातम मनाते हैं।
ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं, जो कर्बला की याद में होते हैं।
मरसिया और नोहे पढ़े जाते हैं, जिनमें शहादत का वर्णन होता है।
कई लोग रोजा रखते हैं और इबादत करते हैं।
👉 लखनऊ, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहर ताजिया परंपरा के प्रमुख केंद्र हैं।
🍲 परंपराएं और सामाजिक पहलू
हलीम/खिचड़ा विशेष पकवान के रूप में बनाया जाता है।
गरीबों में खाना बांटना और सेवा करना इस महीने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
लोग काले या सादे वस्त्र पहनकर शोक व्यक्त करते हैं।
🌍 सार्वभौमिक संदेश
मोहर्रम केवल मुसलमानों का पर्व नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक संदेश है:
अन्याय के सामने झुकना नहीं
सत्य के लिए संघर्ष करना
त्याग और बलिदान को जीवन में अपनाना
⚖️ निष्कर्ष
हजरत इमाम हुसैन की शहादत हमें यह सिखाती है कि सत्य और इंसानियत के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। मोहर्रम हमें अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को अपनाने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
📌 लेखक परिचय
चौधरी शौकत अली चेची
एक सामाजिक चिंतक, लेखक एवं सामयिक विषयों पर गहन अध्ययन करने वाले स्वतंत्र विचारक हैं। आप विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक विषयों पर लेखन करते हैं और जन-जागरूकता से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहते हैं।
⚠️ कानूनी डिस्क्लेमर
यह लेख धार्मिक एवं ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित एक सामान्य जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। किसी भी समुदाय, धर्म या व्यक्ति की भावनाओं को आहत करना इसका उद्देश्य नहीं है।
पाठकों से अनुरोध है कि वे किसी भी धार्मिक परंपरा या मान्यता के संदर्भ में स्थानीय विद्वानों या आधिकारिक स्रोतों से भी जानकारी प्राप्त करें।


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